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उत्तराखंड के स्कूलों में कुमाऊंनी में हो रही प्रार्थना
गणेश उपाध्याय/ अमर उजाला, बागेश्वर
Updated Tue, 19 Aug 2014 02:12 PM IST
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उत्तराखंड में कुमाऊंनी और गढ़वाली को राजभाषा का दर्जा दिए जाने की कोशिश भले ही कामयाब न हुई हों, लेकिन बागेश्वर में इसकी पहल हो चुकी है।
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13 स्कूलों में बेहद अनूठी पहल
बागेश्वर जिले के कपकोट और गरुड़ विकासखंड के 13 स्कूलों में बेहद अनूठी पहल की है मूल रूप से यूपी के हापुड़ जिले के बस्तर गांव निवासी खंड शिक्षाधिकारी आकाश सारस्वत ने।
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इन विद्यालयों में कुमाऊंनी में प्रार्थना कराई जा रही है। शुरुआत करते ही प्रयोग सफल रहने के बाद इन दोनों ब्लाकों के सभी स्कूलों में एक अक्टूबर से कुमाऊंनी में प्रार्थना करवाने की तैयारी है।
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खंड शिक्षाधिकारी आकाश सारस्वत के पास इन ब्लाकों की संयुक्त जिम्मेदारी है। पिछले साल उन्हीं के प्रयासों से जूनियर से माध्यमिक तक के स्कूलों में संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी में प्रार्थना शुरू करवाई गई थी।
सोमवार, मंगलवार और बुधवार को हिंदी, गुरुवार को संस्कृत, शुक्र और शनिवार को अंग्रेजी भाषा में प्रार्थना होती है जबकि कुमाऊंनी में इन दिनों रोजाना प्रार्थना होती है।
जबकि एक अक्टूबर से कुमाऊंनी भाषा में हर हफ्ते बुधवार को प्रार्थना होगी। श्री सारस्वत ने बताया कि हिंदी की प्रार्थना का संस्कृत भाषा में अनुवाद करने में राजकीय हाईस्कूल कौलाग के प्रधानाचार्य घनानंद कांडपाल, विद्या भारती के पूर्व प्रदेश निरीक्षक हरि दत्त जोशी का सहयोग मिला।
प्रयोग हुआ सफल
जबकि अंग्रेजी भाषा में अनुवाद में इंटर कॉलेज गागरीगोल के प्रवक्ता नंदन सिंह अलमियां, डायट के प्रवक्ता डॉ. विमल किशोर थपलियाल और संस्कृत में अनुवाद करने में गरुड़ के साहित्यकार मोहन जोशी, विवेकानंद विद्या मंदिर गरुड़ के आचार्य चंद्रशेखर बड़सीला का सहयोग मिला।
कुमाऊंनी भाषा में प्रार्थना करवाने का फिलहाल स्वैच्छिक प्रयोग शुरू किया गया था। यह प्रयोग सफल हुआ है। जिन 143 स्कूलों में प्रार्थना करवाई जा रही है, वहां के स्थानीय शिक्षकों का इसके अनुवाद में सहयोग मिल रहा है।
एक अक्टूबर से सभी स्कूलों से कुमाऊंनी में प्रार्थना करवाने को कहा गया है। यह प्रयोग इस भाषा के संरक्षण में भी कारगर होगा।
इन स्कूलों में कुमाऊंनी में हो रही प्रार्थना
जीआईसी गरुड़, ऐठान, जीजीआईसी गरुड़, मैगड़ीस्टेट, छत्यानी, हाईस्कूल कोटफुलवारी, जूनियर हाईस्कूल चौरसों, पिंगलो, जीआईसी कर्मी, स्यांकोट, भंतोलां, सिमगड़ी और गोलना।
यह हैं प्रार्थना के बोल
य मातृभूमि मेरी, य पितृभूमि मेरी,
उच्च ठाड़ हिमाल, आकाश चूमणछ,
तली चरणों में, नित सिंधु झूंमणछ।
य देश में हिंदू न मुसलमान चैन हैरो,
हर मजहब जकें छू प्यार, उ इनसान चैन हैरौ।
(यह मातृभूमि मेरी, यह पितृ भूमि मेरी, ऊंचा खड़ा हिमालय, आकाश चूमता है, नीचे चरण तले, नित सिंधु झूमता है। इस देश में न हिंदू, न मुसलमान चाहिए, जिसे हर मजहब हो प्यारा, वो इंसान चाहिए।)