उमा बनी ढाई सौ महिलाओं की 'मां'

अनुसूया प्रसाद मलासी/ अमर उजाला, अगस्त्यमुनि Updated Thu, 23 Jan 2014 10:55 AM IST
save girl child story of uma
अगस्त्यमुनि के कला कोट (गुगली) गांव की उमा ऐसा नाम है, जिसने जिंदगी में विपरीत परिस्थितियों में हार नहीं मानी और खुद के साथ सैकडों महीलाओं को नया जीवन दिया।

अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी

पति ने संतान नहीं होने पर उमा को छोड़ दिया। तो उमा ने चुपचाप आंसू बहाने के बजाय आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी। आज उमा स्वयं सशक्त है।

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उमा ने ढाई सौ महिलाओं को मां बनकर जीना सिखाया है। उमा की बदौलत आज ये सैकडों म‌हिलाएं सिलाई सिखकर सम्मान ‌से जी रही हैं।

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उमा चंद्रापुरी बाजार में सिलाई सेंटर के साथ ही गिफ्ट सेंटर और शृंगार सामग्री बेचने का काम करती है। 18 वर्ष की उम्र में उमा की शादी चोपता हुई, लेकिन संतान नहीं होने पर पति ने उसे छोड़कर दूसरा विवाह कर दिया। तो उमा मायके कलाकोट लौट आई।

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उसके पिता गंगा सिंह नेगी ने उमा को एक सिलाई मशीन दी, जो उसके साथ ही अन्य लड़कियों के लिए अपने पांवों पर खड़ा होने का रास्ता बनी। उमा ने गांव में ही सिलाई सेंटर शुरू किया।

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वर्ष 1999 के भूकंप में उसके सिलाई सेंटर वाला मकान टूट गया। सरकार से उसको कोई मदद नहीं मिली, तब वह भविष्य की चिंताओं को मन में लेकर चंद्रापुरी बाजार आई और वहां उन्होंने एक सिलाई सेंटर खोल दिया। 15 साल में वह चंद्रापुरी बाजार में व्यवसाय कर अपना सम्मान जनक जीवन जी रही है।

ढाई सौ महिलाओं का किया उद्घार
उमा बताती हैं कि चंद्रापुरी के गांव की आसपास की लड़कियों को उसने एक दिन में दो बैच निशुल्क सिलाई सिखाने के लिए चलाए। अब तक करीब ढाई सौ महिलाओं को उमा सिलाई सिखा चुकी हैं।

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उमा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाए जाने वाले जागरूकता अभियानों में भी शामिल होती है। उमा ने अपने साथ भतीजा और भांजे को पढ़ाया। अब वह निराश्रित महिलाओं के कल्याण के लिए अपना शेष जीवन जी रही हैं।

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