धर्म और राजनीति दोनों में महाराज का दबदबा
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1989 में कांग्रेस का दामन थाम कर राजनीतिक सफर की शुरूआत की। 1989 में पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट पर पहला चुनाव लड़ा। राजनीति के साथ ही समान रूप से धर्म के क्षेत्र भी सक्रिय रहे महाराज ने 1995 में एनडी तिवारी के साथ मिलकर तिवारी कांग्रेस बनाई।
1996 में पौड़ी संसदीय सीट से ही पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के खिलाफ चुनाव जीते। केंद्र में रेल राज्यमंत्री और राज्य वित्त मंत्री का पदभार संभाला।
1999 में फिर कांग्रेस में शामिल हुए। 1998,1999 और 2004 में हुए लोक सभा चुनावों में पौड़ी संसदीय सीट से ही हार का सामना किया।
2009 में पौड़ी से ही टीपीएस के खिलाफ चुनाव जीता। इस बीच महाराज रक्षा मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी रहे।
2012 में भी और विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में महाराज का नाम रहा।
सिक्किम पर हैं महाराज की निगाहें
सतपाल महाराज सिर्फ राजनेता नहीं है बल्कि उनके पीछे धर्म का भरा पूरा साम्राज्य है। महाराज के धार्मिक अनुयायियों में सबसे बड़ी संख्या सिक्किम के लोगों की है।
पूरे देश में धार्मिक आयोजन और अनुष्ठान करने वाले महाराज की ख्याति उनके अनुयायियों के बीच धर्म गुरू की भी है। बताते हैं कि सिक्किम में कांग्रेस के नेताओं के लिए महाराज का धार्मिक चोला राह आसान बनाने का काम करता आया है।
ऐसे में भाजपा जो कभी भी नार्थ ईस्ट में अपना खाता नहीं खोल सकी है उसे वहां मजबूती मिलेगी। उम्मीद जताई जा रही है भाजपा सिक्किम से उन्हें उम्मीदवार बना दे।
जाते-जाते हरीश रावत को हिला गए महाराज
सतपाल महाराज एक बार फिर हरीश रावत की कुर्सी हिलाकर गए हैं। महाराज ने मंत्री पत्नी अमृता रावत पर उनका फैसला छोड़ा है लेकिन जिस तरह हरीश रावत के नेता चुने जाने के समय महाराज ने अंकों की ताकत दिखाई थी कमोवेश वैसे ही हालात विधायकों में फिर दिख रहे हैं।
हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने की राह में अंतिम समय तक सबसे बड़ा रोड़ा सतपाल महाराज ही बने थे। वहीं विजय बहुगुणा समर्थक विधायक भी महाराज समर्थन में दिख रहे हैं।
प्रदेश में कांग्रेस के पास 33 विधायक हैं। सरकार को सात सहयोगियों में तीन निर्दलीय, दो बसपा (निलंबित), एक बसपा व एक यूकेडी विधायक चला रहे हैं।
नैथानी ने महाराज पर जताया भरोसा
सहयोगी दलों के फ्रंट पीडीएफ के नेता और मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी महाराज के करीबी हैं और सरकार की चाबी पीडीएफ के पास ही है। नैथानी का कहना है कि पार्टी ने महाराज को अंडर एस्टीमेट किया है।
विभागों के बंटवारे में मंत्री अमृता रावत के साथ नाइंसाफी हुई है। इसके लिए मैंने भी मुख्यमंत्री से दो बार बात की। मुख्यमंत्री विभागों में परिवर्तन की बात तो कहते रहे लेकिन पटाक्षेप नहीं किया। अगर पार्टी सुधार कर रही थी तो देर क्यों हुईं।
उनका कहना है कि उपेक्षा की एक सीमा होती है। इसी तरह कांग्रेस पार्टी ने मेरा टिकट क्यों काटा था।
हरीश रावत सरकार को समर्थन के संबंध में नैथानी का कहना है कि सवाल बीजेपी कांग्रेस का नहीं है मैं निर्दलीय विधायक हूं। पीडीएफ से जुड़े नेताओं की बैठक बुलाई है क्या निर्णय लेना है उसी में तय होगा।
महाराज के सम्पर्क में समर्थक विधायक
महाराज के दिल्ली में इस्तीफा देने और भाजपा में शामिल होने के बाद पूरे प्रदेश की राजनीति में फिर उबाल आया गया है। समर्थक विधायक महाराज के सम्पर्क में बताए जा रहे हैं।
समर्थक विधायकों में अमृता रावत, मंत्री प्रसाद नैथानी, अनुसूया प्रसाद मैखुरी, राजेन्द्र भंडारी, गणेश गोदयाल, डा. जीतराम और सुंदर लाल मन्द्रवाल आदि को उनका सबसे करीबी बताया जा रहा है जो उनके किसी इशारे में कुछ भी करने को तैयार बताए जा रहे हैं।
हालांकि हरीश रावत की ओर से भी इन विधायकों से सम्पर्क साध बातचीत की जा रही है। ताकि किसी भी हाल में कोई विधायक इधर से उधर न हो।
बहुगुणा ने दिखाई महाराज से सहानुभूति
सतपाल महाराज मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। उनके मुद्दे कोई बहुत बड़े नहीं थे। पार्टी को ठीक से हैंडल करना चाहिए था।
-विजय बहुगुणा, पूर्व मुख्यमंत्री
महाराज का पार्टी छोड़कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। पार्टी से नाराज चल रहे थे हम उन्हें मना नहीं सके। हालांकि उनके जाने से उत्तराखंड सरकार पर कोई खतरा नहीं है।
-इंदिरा ह्दयेश, वित्त मंत्री उत्तराखंड