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जिंदा रहने के लिए बीस किलोमीटर की दौड़
गोपेश्वर/ब्यूरो
Updated Thu, 01 Aug 2013 05:19 PM IST
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उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों में ग्रामीणों की मुश्किलें फिलवक्त कम होती नहीं दिख रही हैं। गढ़वाल के सैकडों गांव आज भी हर रोज आपदा से लड़ रहे हैं।
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जिंदगी की जद्दोजहद में इन गांवों के बाशिंदों को जिंदा रहने के लिए हर रोज औसतन 20 किलोमीटर का दुर्गम सफर करना पड़ रहा है।
जिंदगी की इस कठिन डगर पर मीलों के सफर के बावजूद भी ग्रामीणों के हिस्से नाममात्र की राशन ही आ पा रही है, जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के प्रति आक्रोश दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है।
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थराली-ग्वालदम-नंदकेशरी, नंदकेशरी-वाण और नंदकेशरी-थराली मोटर मार्ग आपदा के डेढ़ माह बाद भी बंद पड़ा हुआ है, जिससे चौंडा, काखड़ा, किमनी, माल, बज्वाड़, भैंटा, कूनी, पार्था, गेरुड़, डुंग्री, बूंगा, केराबगड़, रतगांव, बुरसोल, कोलपुड़ी और गुमड़ गांव के लोग करीब 20 किमी पैदल दूरी नापकर राहत के लिए थराली पहुंच रहे हैं।
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पग-पग नाप कर मंजिल तक पंहुच रहे ग्रामीण
ग्रामीण कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटर मार्ग पर नारायणबगड़ तक वाहन से और यहां से आगे दो किमी की पैदल दूरी तय कर नारायणबगड़ बाजार पहुंच रहे हैं। यहां से वाहन में आठ किमी की दूरी तय कर हरमनी जाना पड़ रहा है।
हरमनी में भूस्खलन से ध्याड़ी गांव के पास ग्वालदम सड़क करीब 500 मीटर तक धंस गई है, जिससे आठ सौ मीटर पैदल चल कर मल्थुरा नामक स्थान पर पहुंच रहे हैं। यहां से पुन: वाहन से सुनला तक करीब चार किमी वाहन में सफर कर थराली के नासिर बाजार पहुंच रहे हैं।
मोटर मार्ग बंद
नासिर बाजार से ही ग्रामीण अपने घरों के लिए पैदल सफर कर रहे हैं। पार्था गांव के हयात सिंह बिष्ट, जय सिंह बिष्ट, भेंटा गांव के सुशील रावत, चौंड़ा गांव के मनमोहन सिंह चतुरा, विनोद सिंह रावत और डुंग्री गांव के सेन सिंह का कहना है कि थराली-घाट मोटर मार्ग भी पूर्ण बंद है। खच्चरों को पैदल जाने के लिए भी मार्ग नहीं बचा है।