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केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि सुधार कानूनों के बाद मंडी से आढ़तियों का मोह भंग

Sat, 02 Jan 2021 02:50 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal बसंत कुमार, अमर उजाला, हरिद्वार
बसंत कुमार, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 02 Jan 2021 02:50 PM IST
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roorkee news : After reforms in farming laws adhati interest decrease from mandi
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : AmarUjala
केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि सुधार कानूनों का असर मंडी पर पड़ने लगा है। हालत यह है कि कानून लागू होने के बाद से गल्ला मंडी के करीब आधे आढ़तियों ने छह महीने बाद भी अपने लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया। लाइसेंस की बाध्यता खत्म होने के बाद ये आढ़ती अब मंडी के बाहर ही बिना लाइसेंस के अपना कारोबार कर रहे हैं।
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ज्वालापुर स्थित मंडी में गल्ला मंडी भी चलती है। इसमें आढ़ती दाल, गेहूं, धान, चावल, सरसों, गुड़, मूंगफली, कपास, साबुत मसाले, बाजरा, मक्का, तिल आदि का व्यापार करते हैं। इसके लिए मंडी में कुुल 164 लाइसेंसधारी आढ़ती हैं। इनमें 84 के पास मंडी की दुकानें आवंटित हैं, शेष के पास केवल लाइसेंस हैं, लेकिन ये सभी मंडी के लाइसेंस पर काम करते हैं। इनको अपने लाइसेंस का नवीनीकरण करना होता था, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से पांच जून को लागू तीन नए कृषि कानूनों में आढ़तियों को मंडी के बाहर कहीं भी व्यापार करने की छूट दे दी गई है।
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इसमें मंडी के बाहर न तो लाइसेंस की आवश्यकता है और न ही मंडी शुल्क की। इसके बाद आढ़ती मंडी के लाइसेंस की जरूरत नहीं समझ रहे हैं। आढ़तियों के लाइसेंस की वैधता 30 जून को समाप्त हो गई थी, लेकिन इनमें से 61 ने दिसंबर गुजर जाने के बाद भी लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया है। वहीं, माना जा रहा है कि 83 ने मंडी में आवंटित दुकानों के लालच में लाइसेंस का नवीनीकरण करा लिया है। मंडी के बाहर वाले 80 आढ़तियों में से केवल 20 ने ही नवीनीकरण कराया है, शेष बिना मंडी लाइसेंस के कोई शुल्क दिए कार्य कर रहे हैं। संवाद
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मंडी को हर माह लाखों का नुकसान

नए कानून आने के बाद से मंडी शुल्क में हर माह लाखों का नुकसान हो रहा है। गल्ला मंडी के आढ़तियों की ओर से ही लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराए जाने से जुलाई से प्रतिदिन करीब साढ़े तीन लाख रुपये का घाटा हो रहा है। इन आढ़तियों के कारोबार के चलते मंडी को हर महीने पांच लाख रुपये तक का राजस्व मिल जाता था, लेकिन अब यह डेढ़ लाख पर सिमट गया है। बताया जा रहा है कि पतंजलि और औद्योगिक क्षेत्र स्थित आईटीसी कंपनी से मंडी को हर महीने करीब 20 लाख रुपये का राजस्व मिल जाता था, लेकिन अब यह भी मिलना बंद हो गया है। ऐसे में आने वाले समय में मंडी की आय घटने से वित्तीय संकट गहरा सकता है।


नए कृषि कानूनों से ओपन बाजार मिलने से किसानों को फायदा हो रहा है। क्योंकि, अब वह अपनी मर्जी से कहीं भी सामान बेचकर लाभ उठा रहे हैं, लेकिन मंडी के राजस्व में हानि हो रही है। हालांकि, इस बार सरकारी धान खरीद में मंडी शुल्क मिलने से कुछ राहत मिली है। वरना, मंडी की हालत खस्ता हो जाती। मंडी की आय बढ़ाने के लिए नए विकल्प तलाशे जाएंगे।
- दिग्विजय सिंह देव, सचिव, मंडी समिति, ज्वालापुर
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