अफगान कैंपों में बंधक भारतीयों की दर्दनाक कहानी
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कबूतरबाजी के शिकार भारत से जाने वाले लोग काबुल के कैंपों में बंधकों की तरह रहते हैं। उन्हें कैंप के बाहर जाने नहीं दिया जाता है।
ठगी का शिकार सुधीर थापा ने बताया कैंप संचालक अफगानी पासपोर्ट जब्त करने के बाद खाना देते हैं। कैंपों में सारी रात धमाकों की आवाजें सुनाई देती हैं। लोग सारी रात जागकर काटते हैं।
अमेरिकी कंपनी में ऊंचे वेतन की नौकरी की लालच में कौलागढ़ के सुधीर थापा और पेलियो के मनोज क बूतरबाजी का शिकार हुए थे। सुधीर ने बताया उन्हें 60 हजार रुपये मासिक वेतन पर नौकरी देने के लिए कहा गया था।
दून से ले जाकर काबुल में अफगानी कैंप में छोड़ दिया गया। वहां कबूतरबाजी का शिकार हुए 50 भारतीय रह रहे थे। सभी अलग-अलग प्रांतों से आए थे।
खाने पर रोज बढ़ता जाता है कर्ज
बताया कि दो दिन तक भूखे रहने के बाद कैंप संचालक से घर से पैसे मंगाकर देने का निवेदन करके उसने पासपोर्ट लिया। खाने का सामान कैंप संचालक देता था लेकिन खाना खुद बनाना पड़ता था। पांच सौ रुपये प्रतिदिन खाने के हिसाब से कर्ज जोड़ा जाता था।
घर से पैसा पहुंचने पर कर्ज चुकाने के बाद पासपोर्ट मिला। कैंप से छूटे और गुरुद्वारे में पहुंचे। यहां से टिकट का इंतजाम कराया और कागजी खानापूरी होने पर घर वापस आ पाए।
साइड बिजनेस है कबूतरबाजी
अफगानिस्तान में अमेरिका और दूसरे देशों की कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी देश के कबूतरबाजों के लिए काम करते हैं। इनका नेटवर्क पूरे देश में फैला है। हर प्रांत के एजेंट अपने यहां के बेरोजगारों को नौकरी का झांसा देते हैं।
पैसे देने की स्थिति वालों को फंसाया जाता है। सुधीर ने बताया कि उनके साथ ठगी करने वाला सुखदेव भी अफगानिस्तान में एक कंपनी में काम करता है।