सबके राम: पुलिस से बचने के लिए वेश बदल कर रहते थे....सांसद नरेश बंसल ने साझा कीं राम आंदोलन की पुरानी यादें
भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष व सांसद नरेश बंसल ने राम आंदोलन की पुरानी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान रामभक्तों को रोकने के लिए आई पुलिस ने भगवान राम की मूर्ति गिरने नहीं दी।
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विस्तार
विजय दशमी का दिन था। देहरादून के पंचायती मंदिर से भगवान श्रीराम की विजय यात्रा निकाली जा रही थी, लेकिन राम भक्तों को यात्रा करने से रोकने के पहले से ही वहां भारी संख्या में पुलिस बल तैनात हो चुका था। हमारी ट्रैक्टर पर भगवान श्रीराम की मूर्ति रखकर यात्रा निकालने की योजना थी, लेकिन पुलिस ने यात्रा करने से रोक दिया।
संघ के वरिष्ठ नेता देवेंद्र शास्त्री ने अपने कंधे पर मूर्ति रख दी और बड़ी संख्या में जुटे राम भक्त उनके पीछे-पीछे चल पड़े। पुलिस से खूब खींचतान हुई। इस संघर्ष में शास्त्रीजी के कंधे पर रखी मूर्ति डगमगाने लगी। इससे पहले कि मूर्ति नीचे गिरती खुद दो पुलिसकर्मी दौड़ कर वहां पहुंचे और उन्होंने मूर्ति गिरने से बचा ली।
मैं उस समय बैंक में कार्यरत था।देहरादून में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दायित्व भी देखता था। मुझे रामशिला पूजन कार्यक्रम का संयोजक बनाया गया था। उस दौर की कई दिलचस्प यादें हैं। हमने साध्वी ऋतंभरा की सभाएं देहरादून में कराई। परेड ग्राउंड में वह सभा ऐतिहासिक थी। करीब 50 हजार की भीड़ सभा में पहुंची थी। राम मंदिर का आंदोलन धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा था।
विजय यात्रा के लिए तैयार किया गया एक ट्रैक्टर
मुझे एक घटना याद आती है। विजयदशमी का दिन था। हमने तय किया था पंचायती मंदिर से भगवान श्रीराम की विशाल विजय यात्रा निकाली जाएगी। इस कार्यक्रम की कमान मेरे हाथों में थी। बड़ी संख्या में रामभक्त पंचायती मंदिर के आसपास जुटे थे। उस समय देहरादून में प्रताप सिंह जिलाधिकारी थे। विजय यात्रा के लिए एक ट्रैक्टर को तैयार किया गया।
इसमें भगवान श्रीराम की एक मूर्ति रखी गई, लेकिन वहां बड़ी संख्या पहुंची पुलिस ने यात्रा नहीं निकलने दी। डीएम ने साफ निर्देश दे दिए कि कोई यात्रा नहीं निकलेगी। यात्रा रोकने के लिए सड़क के हिस्से में बसें खड़ी कर दी गईं। दूसरी ओर से बड़ी संख्या पुलिसकर्मी खड़े हो गए। स्थिति बहुत तनावपूर्ण हो गई थी। खींचतान और संघर्ष के बीच राम भक्त यात्रा निकालने में कामयाब रहे।
पुलिस ने हमारी गिरफ्तारी के लिए सारे घोड़े खोल दिए
हमें कालिका भवन, गीता भवन का विशेष सहयोग मिलता था। जगह-जगह शिला पूजन के कार्यक्रम हो रहे थे। हम पुलिस-प्रशासन की नजरों में चढ़ गए थे। पुलिस हमारी गिरफ्तारी की योजना बना रही थी। हमारे कुछ साथी पुलिस की गिरफ्त आ भी गए। चूंकि कार्यक्रम को और आगे बढ़ाना था, इसलिए हमारे पुलिस की गिरफ्त से बचना जरूरी था। हम वेश बदल कर रहते थे।
कार्यक्रमों की सूचना और उनकी खबरें अखबारों में प्रकाशित कराने के लिए एक टाइप राइटर हमारे पास होता था। मुझे याद है कि जिस दिन ढांचा गिरा, उस दिन पुलिस ने हमारी गिरफ्तारी के लिए सारे घोड़े खोल दिए। तब मेरा बेटा दो या तीन साल का रहा होगा। दिवाली के दिन भी हम सिर्फ एक घंटे के लिए अपने घर जा सके। हमारी टीम के एक सहयोगी अशोक राय के घर पर ही हमारा डेरा था।
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ब्रह्मदत्त त्यागी व अन्य साथी मिलकर पुलिस से बचते-बचाते अपने अभियान को अंजाम देते रहे। हम आज गौरवान्वित हैं कि भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर की जिस कल्पना के लिए करोड़ों राम भक्तों ने आंदोलन किया था, वह अब साकार होने जा रहा है।
(नरेश बंसल, वर्तमान भाजपा के राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष और राज्य सभा के सदस्य हैं)