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बायोमेडिकल वेस्ट छोड़ने वाले अस्पतालों पर 'तलवार'

Fri, 11 Sep 2015 01:00 PM IST
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 11 Sep 2015 01:00 PM IST
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pollution control board took action on hospital.

देहरादून में तमाम अस्पतालों का बायोमेडिकल वेस्ट जहां-तहां ठिकाने लगाया जा रहा है। उत्तराखंड पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऐसे अस्पतालों पर नजर टेढ़ी कर दी है। बोर्ड ऐसे अस्पतालों को नए सिरे से चिह्नित करने का काम कर रहा है।

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बोर्ड को शिकायतें मिल रही थी कि कई अस्पताल बायोमेडिकल वेस्ट का निस्तारण सही तरीके से नहीं कर रहे हैं। इससे आमजन के साथ पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। इस पर बोर्ड ने अस्पतालों को नोटिस भेजे हैं।
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बोर्ड सूत्रों के मुताबिक, बायोमेडिकल वेस्ट जहां-तहां डालने वाले अस्पतालों पर कार्रवाई करते हुए सीज किया जा सकता है। लेकिन अस्पतालों में मरीजों के भर्ती होने पर ऐसा करने में व्यवहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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इसलिए कई बार ये अस्पताल चेतावनी के बावजूद मनमानी पर उतारू हो जाते हैं। हालांकि, अब बोर्ड इन अस्पताल संचालकों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए सीधे अदालत में वाद दायर कर रहा है।

अस्पतालों के लिए यह होगा जरूरी
पहले से संचालित अस्पतालों को इस बात का प्रमाण देना होगा कि उन्होंने मेडिकल पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी से टाईअप कर दिया है। इस वेस्ट को कमेटी के रुड़की स्थित बायोमेडिकल ट्रीटमेंट प्लांट में पहुंचाया जाता है। इसी तरह, नए अस्पतालों को बोर्ड तभी एनओसी देगा जब उनके पास कमेटी के साथ टाईअप का प्रमाण पत्र रहेगा।

ये है बायोमेडिकल वेस्ट
इलाज में प्रयुक्त ग्लूकोज की बोतलें, पट्टियां, इंजेक्शन, ब्लेड, सर्जिकल उपकरण, ऑपरेशन के बाद निकलने वाले शरीर के छोटे-छोटे पार्ट्स और डिस्पोजल दवाएं आदि इसमें शामिल हैं।

इससे है बीमारियों का खतरा
दून अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. एसडी जोशी ने का कहना है कि बायोमेडिकल वेस्ट के खुले में पड़ने से संक्रामक रोगों और इंफेक्शन के तेजी से फैलने का खतरा रहता है। इसके संपर्क में आए पानी का इस्तेमाल करने पर शरीर में खुजली, पीलिया, टाइफाइड, उल्टी दस्त होने की प्रबल संभावना रहती है। छोटे बच्चों को जल्द ही निमोनिया हो जाता है।


समय-समय पर बोर्ड की टीम अस्पतालों का निरीक्षण करती है। अस्पतालों को नोटिस भी भेजे जाते हैं। बोर्ड की सख्ती के बाद कई अस्पताल इसके लिए आवेदन करने लगे हैं। नियम का पालन न करने वाले अस्पतालों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज कराई जा रही है।
- विनोद सिंघल, सदस्य सचिव उत्तराखंड पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

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