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सियासी घमासान में बीआरओ चित
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 03 Aug 2014 05:12 PM IST
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उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की खस्ताहाल स्थिति ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया है।
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राजनीति ने मार्गों की दशा और बिगाड़ दी
सड़कों के रखरखाव पर शुरू हुई केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच खींचतान से एक बार फिर बीआरओ निशाने पर है। आपदा के बाद राष्ट्रीय राजमार्गों और सीमांत सड़कों के निर्माण के लिए शुरू हुई राजनीति ने मार्गों की दशा और बिगाड़ दी है।
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प्रदेश के तीन राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाल स्थिति पर लंबे समय से सियासत हावी है। बीते वर्ष गढ़वाल में बीआरओ के खिलाफ सरकार की नाराजगी दिखी तो अब संगठन पर सुस्ती के आरोप पर कुमाऊं में उबाल है।
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जून 2013 में आई आपदा के बाद सड़कों को पहुंची भारी क्षति से जब सियासत तेज हो गई तो बीआरओ ने हाथ खड़े कर दिए थे।
राज्य सरकार जनवरी 2014 तक यह तय नहीं कर पाई कि क्षतिग्रस्त सड़क मार्ग के निर्माण किस एजेंसी से करवाया जाए।
फरवरी में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय और बीआरओ के साथ संयुक्त बैठक के बाद फरवरी में तय हुआ कि सभी सड़कें बीआरओ बनाएगा जबकि लोक निर्माण विभाग सहयोगी एजेंसी रहेगी।
इस बीच बीआरओ ने खुद को सीमांत सड़कों तक सीमित करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव दिया कि मार्च 2015 के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग बीआरओ अन्य एजेंसी को दिया जाए।
प्रस्ताव पर सहमति बन चुकी है जिसके तहत राष्ट्रीय राजमार्ग का केदारनाथ से रुद्रप्रयाग, ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग, थराली से लामबगड़, टनकपुर से पिथौरागढ़ हिस्सा अन्य निर्माण एजेंसी के अधीन जाएगा।
आपदा से निपट नहीं पा रहा बीआरओ
प्रदेश में हर वर्ष मानसून में आने वाली आपदा बीआरओ के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। आपदा के बाद पहले राज्य सरकार से निर्माण सामग्री को लेकर असहयोग रहा।
अभी तक क्रशर लगाने के प्रस्ताव विचाराधीन हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में विकसित हुए भूस्खलन जोन एक बार फिर समस्या बने हुए हैं। सबसे बड़ी दिक्कत देरी से शुरू हुआ पुनर्निर्माण है जिसके लिए केवल दो माह बीआरओ को मिल पाए।
केंद्र अनदेखी रही प्रस्तावों पर
वर्ष 2012 तक बीआरओ के प्रस्तावों पर केंद्रीय परिवहन एवं हाईवे मंत्रालय ने कोई तरजीह नहीं दी। तीन बरस में लगभग 110 निर्माण प्रस्तावों से महज 26 को स्वीकृति मिली।
जून 2013 की आपदा के नौ माह बाद प्रस्ताव भेजे गए जिससे समस्त सड़कों के पुनर्निर्माण में देरी हुई है।
दो प्रोजेक्टों में 13 सौ किमी सड़कें
उत्तराखंड में सीमा सड़क संगठन के दो प्रोजेक्ट शिवालिक (गढ़वाल क्षेत्र) और हीरक (कुमाऊं क्षेत्र) में लगभग 1300 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों और सीमांत सड़क निर्माण के लिए अधिकृत हैं।
ऋषिकेश से गंगोत्री, ऋषिकेश से जोशीमठ और टनकपुर पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग के अलावा 19 सामरिक महत्व की सीमांत सड़कों का निर्माण बीआरओ के पास है।