{"_id":"582298a34f1c1b8553b3954e","slug":"political-story-on-uttarakhand-foundation-day","type":"story","status":"publish","title_hn":"उत्तराखंडः सोलह साल में बस छल-प्रंपच और चाल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उत्तराखंडः सोलह साल में बस छल-प्रंपच और चाल
राकेश खंडूड़ी / अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 09 Nov 2016 09:02 AM IST
विज्ञापन
uttarakhand state movement
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जनांदोलन से निकले उत्तराखंड राज्य को आज 16 बरस पूरे हो चुके हैं। इस आंदोलन की मूल अवधारणा यही थी कि राज्य के नीति-नियोजन में जनता की भागीदारी होगी।
विज्ञापन
तरक्की का रास्ता वह खुद तैयार कर सकेगी। मगर अतीत के पन्ने जब खुलते हैं तो पता चलता है कि 16 साल में राज्य की जनता अपना मुख्यमंत्री तक तय नहीं कर सकी। दिल्ली से मुख्यमंत्री तय होते रहे और नीति के नाम पर हुक्मरान और नीति नियंता खनन, शराब और रियल एस्टेट के कारोबार पर जोर देते रहे।
विज्ञापन
पर्यटन, कृषि, उद्यान, ऊर्जा और दक्ष मानव संसाधन सरीखी संभावनाओं वाले क्षेत्रों में सरकारों के प्रयास जनता को नाउम्मीद करते रहे। कमोबेश, राज्य की दशा उस गैरसैंण की तरह हो गई है, जिसके लिए अब तक सिर्फ विलाप ही होता आया है। मौजूदा सरकार ने उम्मीद जरूर दिखाई है, मगर निर्णय लेने का साहस तो वो भी नहीं कर रही।
विज्ञापन
सरकारों के आइने से राज्य की तस्वीर सुहावनी दिखाई देती है और विपक्ष को उसमें सिर्फ नाकामी ही दिखती है। मगर राज्य गठन की मूल अवधारणा पर सरकारों के काम को परखते हैं तो तस्वीर उतनी निराली नहीं दिखती। समग्र रूप में विकास की सुनहरी इबारतें पर्वतीय भूभाग में फीकी पड़ जाती हैं।
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी रणजीत सिंह वर्मा कहते हैं,‘हमने ऐसा राज्य नहीं चाह था।’ मगर सरकारों ने यह दिखाने का प्रंपच किया कि वे बेशक पहाड़ में डॉक्टर नहीं पहुंचा पाई। रोजगार के संसाधन विकसित नहीं कर सकी। बढ़ते कर्ज से मुक्ति का रास्ता नहीं तलाश सकी, लेकिन उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं रही। सत्ता में बने रहने के लिए सिर्फ चालें चली जाती रहीं।
अपनी उम्र से आधे तो यह राज्य मुख्यमंत्री देख चुका है। राज्य के लोगों ने देखा कि किस तरह सत्ता और सियासत के लिए पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को गिराने में हदें पार कर गए। विधानसभा अध्यक्ष सरीखी संस्था तक की गरिमा तक महफूज नहीं रह पाई। लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि राज्य में कुछ नहीं हुआ। लेकिन उम्मीद इससे कहीं ज्यादा थी?