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पीएम मोदी का केदारनाथ दौरा: प्रधानमंत्री की साधना स्थली को भूल गई सरकार, 2017 में यहां बिताया था कुछ समय, पढ़ें खास रिपोर्ट

Thu, 04 Nov 2021 03:31 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनय बहुगुणा, संवाद न्यूज एजेंसी, रुद्रप्रयाग
विनय बहुगुणा, संवाद न्यूज एजेंसी, रुद्रप्रयाग Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 04 Nov 2021 03:31 PM IST
सार

भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) के वैज्ञानिक दीपक श्रीवास्तव और उनकी टीम ने 1991 से 1994 तक केदारनाथ मंदिर और आसपास के क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया था। इस दौरान वैज्ञानिकों ने हर मौसम में वहां रहते हुए रिपोर्ट तैयार थी।

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PM Narendra Modi Kedarnath Visit: Government forgot the place of worship of the Prime Minister
केदारनाथ गुफा में ध्यानरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई फाइल फोटो

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साधना स्थली रही गरुड़चट्टी उपेक्षा का शिकार है। लगभग तीन दशक पूर्व भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के विशेषज्ञ इसे टाउनशिप के रूप में विकसित करने की बात अपनी रिपोर्ट में कह चुके हैं। लेकिन इस दिशा में कार्ययोजना तक नहीं बन पाई है। जून 2013 की आपदा के बाद से यह प्राचीन मंदिरों व धर्मशालाओं का क्षेत्र वीरान पड़ा है। इन आठ वर्षों में यहां गिनती के श्रद्धालु ही पहुंचे हैं।

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केदारनाथ मंदिर के आसपास अधिक निर्माण कार्य सही नहीं
भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) के वैज्ञानिक दीपक श्रीवास्तव और उनकी टीम ने 1991 से 1994 तक केदारनाथ मंदिर और आसपास के क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया था। इस दौरान वैज्ञानिकों ने हर मौसम में वहां रहते हुए रिपोर्ट तैयार थी। यह रिपोर्ट ‘ऑन इंटीग्रेटेड आइस, स्नो एवलांच एंड क्वार्टनरी जियोलॉजिकल स्टडीज इन मंदाकिनी वेली अराउंड केदारनाथ, डिस्ट्रिक्ट चमोली, उत्तर प्रदेश’ नाम से जारी की गई थी।

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इसमें कहा गया था कि केदारनाथ मंदिर के आसपास अधिक निर्माण कार्य सही नहीं है। रिर्पोट में मंदाकिनी नदी के बायीं तरफ केदारनाथ मंदिर से एक किमी पहले स्थित गरुड़चट्टी क्षेत्र को एवलांच फ्री बताया गया था। वैज्ञानिकों का कहना था कि यात्राकाल में केदारनाथ में दबाव करने के लिए गरुड़चट्टी को टाउनशिप के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने क्षेत्र को भूस्खलन से भी सुरक्षित बताया था। 

भूस्खलन की चपेट में गरुड़चट्टी 

जून 2013 की आपदा के बाद भी अक्तूबर माह में जीएसआई के विशेषज्ञों ने गरुड़चट्टी का भू-गर्भीय सर्वेक्षण किया था। तब भी यह क्षेत्र आपदा की दृष्टि से सुरक्षित पाया गया था। लेकिन आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी गरुड़चट्टी उपेक्षा का शिकार है। रामबाड़ा-गरुड़चट्टी-केदारनाथ पैदल मार्ग आज भी रामबाड़ा से आगे ध्वस्त है।

 

इस रास्ते के पुनर्निर्माण का मामला फॉरेस्ट एक्ट में फंसा हुआ है। वहीं, केदारनाथ से गरुड़चट्टी को जोड़ने के लिए मंदाकिनी नदी पर पुल कार्य चल रहा है। यह क्षेत्र आज भी वीरान है। केदारनाथ व्यापार सभा के पूर्व अध्यक्ष महेश बगवाड़ी, तीर्थपुरोहित लक्ष्मीनारायण जुगराण, बाबा ललित जी महाराज का कहना है कि आपदा के बाद से किसी अधिकारी ने गरुड़चट्टी की सुध नहीं ली है।

आपदा के बाद से मंदाकिनी नदी के दोनों तरफ तेज भू-कटाव हो रहा है, जिसका असर अब गरुड़चट्टी क्षेत्र पर भी दिखने लगा है। भूकटाव का दयारा गरुड़चट्टी में बने भवनों के समीप पहुंच गया है। लेकिन इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए कार्ययोजना तक नहीं बन पाई है। 20 अक्तूबर 2017 को पीएम मोदी ने केदारनाथ धाम पहुंचने पर गरुड़चट्टी में बिताए दिनों को याद किया था। उन्होंने यहां 1980 में डेढ़ महीने साधना की थी। उन्होंने इस स्थान को विकसित करने पर जोर दिया था। इसके बाद शासन ने केदारनाथ से गरुड़चट्टी तक के लिए साढ़े तीन किमी पैदल मार्ग का निर्माण कराया था। इस रास्ते को केदारनाथ से जोड़ने के लिए मंदाकिनी नदी पर स्टील गार्डर पुल बनाया जा रहा है।

गरुड़चट्टी के बिना केदारनाथ धाम की कल्पना नहीं की जा सकती। यह क्षेत्र आपदा से पूर्व यात्रियों व साधु-संतों का प्रमुख ठौर था। लेकिन आपदा के बाद से इस क्षेत्र को न तो मंदिर से जोड़ने के लिए प्रयास हो रहे हैं और न यहां सुविधाएं जुटाई जा रही हैं।
- मनोज रावत, विधायक, केदारनाथ

गरुड़चट्टी को विकसित करने को लेकर कोई योजना फिलहाल नहीं है। पूर्व में क्या सर्वेक्षण हुआ था, इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। जीएसआई की रिपोर्ट का अध्ययन किया जाएगा, उसी के आधार पर योजना तैयार की जाएगी।
- मनुज गोयल, जिलाधिकारी, रुद्रप्रयाग

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