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Dehradun News: चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाकर लोगों ने की सुख-समृद्धि की कामना
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सिद्धपीठ महासू देवता मंदिर में पारंपरिक अंदाज में मनाया गया चीड़ा संक्रांति का पर्व
ग्रामीणों ने महासू देवता से मांगी मन्नतें
भादो मास की संक्रांति के पहले दिन हनोल स्थित जौनसार-बावर के सिद्धपीठ महासू देवता मंदिर में चीड़ा संक्रांति का पर्व पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। श्रद्धालुओं ने लोक परंपरा के तहत सबसे पहले महासू मंदिर में चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाया। इसके बाद अपने-अपने घरों के पास चीड़ा लगाकर सुख और समृद्धि की कामना की।
जौनसार बावर में एक माह तक चलने वाले चीड़ा संक्रांति के त्योहार की शुरूआत हो गई। लोक मान्यता के अनुसार भादो मास में हर साल चीड़ा संक्रांति के दिन देव पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सिद्धपीठ महासू देवता मंदिर हनोल के दरबार में पास के जंगल से लाई गई चीड़ की लकड़ी के चीड़े को परंपरागत तरीके से मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने लगाकर होती है।
मंदिर में चीड़ा लगने के उपरांत बावर, शिलगांव, देवघार, लखौ, फनार, कैलेऊ, बाणाधार, कंडमाण, भरम समेत क्षेत्र की 11 खतों और सीमा से सटे जिला उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र में सैकड़ों ग्रामीण परिवारों ने देवता से सुख समृद्धि की कामना की। अपने-अपने घरों में विधि-विधान से चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाया।
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बताते चलें कि मंदिर और घरों में लगे देव चीड़े की जोत प्रतिदिन शाम को नियमित रूप से जलेगी। स्थानीय ग्रामीणों की माने तो भादो मास में भूत-प्रेत और अन्य बुरी छाया पड़ने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इससे बचने के लिए क्षेत्रवासी कुल देवता महासू महाराज की आराधना कर अपने घरों के पास चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाकर रोजाना शाम को उसकी पूजा अर्चना करते हैं।
महासू मंदिर समिति के सचिव एवं पुरोहित मोहनलाल सेमवाल ने कहा क्षेत्र में सदियों से चली आ रही देव पर्व की लोक परंपरा कायम है। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने महासू देवता से मन्नतें मांगी। इस मौके पर मंदिर की पूजा-पाठ व परंपरागत व्यवस्था से जुड़े कारसेवक और ग्रामीण मौजूद रहे।
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ग्रामीणों ने महासू देवता से मांगी मन्नतें
भादो मास की संक्रांति के पहले दिन हनोल स्थित जौनसार-बावर के सिद्धपीठ महासू देवता मंदिर में चीड़ा संक्रांति का पर्व पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। श्रद्धालुओं ने लोक परंपरा के तहत सबसे पहले महासू मंदिर में चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाया। इसके बाद अपने-अपने घरों के पास चीड़ा लगाकर सुख और समृद्धि की कामना की।
जौनसार बावर में एक माह तक चलने वाले चीड़ा संक्रांति के त्योहार की शुरूआत हो गई। लोक मान्यता के अनुसार भादो मास में हर साल चीड़ा संक्रांति के दिन देव पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सिद्धपीठ महासू देवता मंदिर हनोल के दरबार में पास के जंगल से लाई गई चीड़ की लकड़ी के चीड़े को परंपरागत तरीके से मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने लगाकर होती है।
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मंदिर में चीड़ा लगने के उपरांत बावर, शिलगांव, देवघार, लखौ, फनार, कैलेऊ, बाणाधार, कंडमाण, भरम समेत क्षेत्र की 11 खतों और सीमा से सटे जिला उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र में सैकड़ों ग्रामीण परिवारों ने देवता से सुख समृद्धि की कामना की। अपने-अपने घरों में विधि-विधान से चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाया।
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बताते चलें कि मंदिर और घरों में लगे देव चीड़े की जोत प्रतिदिन शाम को नियमित रूप से जलेगी। स्थानीय ग्रामीणों की माने तो भादो मास में भूत-प्रेत और अन्य बुरी छाया पड़ने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इससे बचने के लिए क्षेत्रवासी कुल देवता महासू महाराज की आराधना कर अपने घरों के पास चीड़ की लकड़ी का चीड़ा लगाकर रोजाना शाम को उसकी पूजा अर्चना करते हैं।
महासू मंदिर समिति के सचिव एवं पुरोहित मोहनलाल सेमवाल ने कहा क्षेत्र में सदियों से चली आ रही देव पर्व की लोक परंपरा कायम है। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने महासू देवता से मन्नतें मांगी। इस मौके पर मंदिर की पूजा-पाठ व परंपरागत व्यवस्था से जुड़े कारसेवक और ग्रामीण मौजूद रहे।