बिकने लगे एचएमटी में लगे स्विट्जरलैंड और जापान के कलपुर्जे, पढ़िए देश की घड़ी की पूरी कहानी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एचएमटी रानीबाग (हल्द्वानी) इकाई में लगे स्विट्जरलैंड और जापान के कलपुर्जों को बिक्री शुरू हो गई है। पहले देश में घड़ी का मतलब एचएमटी हुआ करता था। पिता अपने बेटे को गिफ्ट में यह घड़ी देते थे। शादी में वर-वधू को उपहार स्वरूप ये घड़िया दी जाती थीं। उस वक्त एचएमटी की घड़ी पहनना शान की बात होती थी।
तब शोरूम में 350 से लेकर सात हजार रुपए तक की घड़ियां होती थीं। सूट में घड़ी रखना फैशन होता था। गांधी घड़ी (पाकेट वॉच) को लोग सूट की जेब में रखकर उसकी चेन बाहर लटकाते थे। एचएमटी ही एकमात्र गांधी घड़ी बनाती थी। तब रानीबाग में सालाना पांच सौ गांधी घड़ी बनती थी, जिनमें दो सौ मेकेनिकल और तीन सौ क्वार्ट्ज शामिल थी। फैक्ट्री कर्मियों के मुताबिक गांधी घड़ी का क्रेज पुराने लोगों में ज्यादा था।
सोने का बिस्कुट लगी घड़ी भी बनी थी
रानीबाग इकाई में 1995 से 2000 तक जी-10 के नाम से सोने का बिस्कुट लगी घड़ी भी बनाई गई। इसकी कीमत लगभग 11 हजार रुपए थी। घड़ी की खासियत ही यह थी कि सुई के नीचे छोटा सा सोने का बिस्कुट लगा होता था।सारी घड़ियां हाथों-हाथ बिकी थीं।
एचएमटी की घड़ियों के लिए आर्मी कैंटीन में भी लोगों को इंतजार करना पड़ता था। पूरे देश में लगभग छह लाख घड़ियों का ऑर्डर सालाना एचएमटी वॉच ग्रुप को मिलता था। आर्मी कैंटीन को घड़ियों की सप्लाई करने में लगभग एक माह का समय लग जाता था। आर्मी कैंटीन में घड़ी के आने की बेताबी से प्रतीक्षा की जाती थी।
1995 के बाद शुरू हुआ डाउन फॉल
1993 में टाइटन को लाइसेंस मिलने के बाद से ही एचएमटी की स्थिति खराब होने लगी। टाइटन ने बाजार के अनुरूप अपने को ढाला और क्वार्ट्ज घड़ियों की श्रृंखला बाजार में उतारी। एचएमटी प्रबंधन ने अपने को अपडेट नहीं किया। वर्ष 1995 से एचएमटी का डाउन फाल शुरू हो गया।
जनता, कोहिनूर, पायलट और सोना थी पहली पसंद
एचएमटी वॉच ग्रुप के स्वर्णिम दौर में कोहिनूर, पायलट, जनता ओर सोना के नाम से बनने वाली घड़ियां लोगों की पहली पसंद हुआ करती थी। इन घड़ियों की सबसे अधिक मांग थी। इनकी कीमत भी अधिक होती थी।
शोरूमों में घड़ियों की मांग पूरी नहीं हो पाती थी। रानीबाग से घड़ियां बनकर दिल्ली जाती थीं। प्राइवेट कंपनियों की आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन से एचएमटी की घड़ियां बाजार में टिक नहीं पाई और साल 2014 में भारत सरकार ने एचएमटी कंपनी को बंद करने का फैसला लिया था।