अमर उजाला खास खबर: अब देशभर में कहीं भी रेलवे ट्रैक पर कटकर नहीं मरेंगे हाथी, इजाद किया ये सिस्टम
विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की यूनिट साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन, चंडीगढ़ (सीएसआईओ) ने इंटेलीजेंस एलिफेंट मूवमेंट डिटेक्शन एंड अलर्ट सिस्टम इजाद किया है।
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आने वाले समय में उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश में जंगल के भीतर से गुजर रही रेलवे लाइनों में हाथियों और दूसरे जंगली जानवरों के कटकर मरने की घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी। इसके लिए विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की यूनिट साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन, चंडीगढ़ (सीएसआईओ) ने इंटेलीजेंस एलिफेंट मूवमेंट डिटेक्शन एंड अलर्ट सिस्टम इजाद किया है। खास बात यह है कि केंद्र सरकार के इस पायलट प्रोजेक्ट का परीक्षण उत्तराखंड में राजाजी टाइगर रिजर्व के कांसरों रेंज में किया गया, जो पूरी तरह सफल रहा है।
1987 से 2018 के बीच लगभग 25 हाथियों की मौत
वर्तमान में हाथियों को रेलवे दुर्घटना से बचाने के लिए ट्रेनों को धीमा करने, चेतावनी साइन बोर्ड, जानवरों की उपस्थिति वाले क्षेत्रों में गश्ती दल की तैनाती, हाथी गलियारों की पहचान करते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरतने जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न सेंसर आधारित तकनीकों जैसे रेडियो कॉलर, सक्रिय अवरक्त सेंसर, जैव-ध्वनिक उपकरण, दृष्टि, भूकंपीय सेंसर आदि का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन यह इतने कारगर सिद्ध नहीं हो रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजाजी टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले हरिद्वार-देहरादून रेलवे लाइन के 18 किमी ट्रैक में रेल से कटकर 1987 से 2018 के बीच लगभग 25 हाथियों की मौत हुई है।
परियोजना से जुड़े डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिक डॉ. बिलाल हबीब और डॉ. पराग निगम ने बताया कि पिछले दिनों हरिद्वार में हुई एक कांफ्रेंस में उत्तरखंड वन विभाग, हाथी परियोजना भारत सरकार, भारतीय वन्य जीव संस्थान और मुरादाबाद से नार्दर्न रेलवे के सिंग्निलिंग सिस्टम के इंजीनियरों ने इस सिस्टम को रेलवे में लागू करने पर मंथन किया। यह सिस्टम हाथी सहित तमाम जानवरों को जंगल से गुजर रही रेलवे लाइन पर आने से पहले ही डिटेक्ट कर लेता है। इसके बाद एक मैसेज जनरेट करते हुए इसे रेलवे के ड्राइवर तक पहुंचा देता है।
उन्होंने बताया कि यह सेंसर पूरी तरह से मिट्टी के अंदर दब जाते हैं, ताकि इसे जानवरों द्वारा क्षतिग्रस्त न किया जा सके या मनुष्यों द्वारा छेड़छाड़ न की जा सके। यह पूरी प्रणाली सौर ऊर्जा पर आधारित है। प्रारंभिक तौर पर इस प्रणाली को सबसे पहले उत्तराखंड में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके बाद इसे देशभर में लागू किया जाएगा।
हरिद्वार-दून रेलवे ट्रैक पर आरटीआर के कांसरों रेंज में किया गया परीक्षण
इस सिस्टम का परीक्षण करने के लिए वर्ष 2018 से इस पर काम किया जा रहा है। इस प्रणाली का परीक्षण करने के लिए लगभग 400 मीटर की लंबाई के हरिद्वार-देहरादून ट्रैक के पश्चिमी हिस्से को चुना गया। यह स्थान आरटीआर के कांसरों वन विश्राम गृह से लगभग 600 मीटर की दूरी पर स्थित है।
इसमें थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संचालित भूकंपीय संकेतों और थर्मल इमेज से पता चल जाता है कि रेलवे ट्रैक के आसपास कोई हाथी या जानवरों का झुंड गुजर रहा है। दोनों प्रणालियों से सूचना को सर्वर पर ग्राफिकल यूजर इंटरफेस में प्रेषित किया जाता है। ताकि दोनों सेंसिंग तौर-तरीकों से जानवरों की सही स्थित का पता लगाया जा सके। इसके बाद सर्वर से होते हुए यह सूचना रेल ड्राइवर तक पहुंचा दी जाती है।
यूनिट साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन, चडीगढ़ (सीएसआईओ) ने इंटेलिजेंस एलिफेंट मूवमेंट डिटेक्शन एंड अलर्ट सिस्टम का प्रदर्शन किया। यह एक उच्च तकनीक पर आधारित प्रणाली है। इसके लागू होने से रेलवे ट्रैक पर वन्य जीवों को खासकर हाथियों की कटकर मौत की घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी। रेलवे के अधिकारियों ने सिस्टम को पूरी तरह से समझ लिया है, अब देखने वाली बात होगी कि रेलवे इस सिस्टम को कब तक लागू करता है।
- जेएस सुहाग, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक