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'उत्तराखंड में प्लास्टिक ही नहीं, थर्माकोल भी करें बैन'

ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 02 Feb 2016 01:53 PM IST
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Not plastic, thermocol ban also.
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एनजीटी के आदेश को देखते हुए उत्तराखंड शासन ने नगर निकायों को अपने क्षेत्रों में प्लास्टिक के साथ ही थर्माकोल के उपयोग पर रोक लगाने को कहा है।
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निकाय संसाधन न होने की वजह से शासन के इस आदेश को लागू करने की स्थिति में नही है। ऐसे में निकाय यह भी मान रहे हैं कि शासन ने आदेश जारी कर अपने सिर से बला टाली है। उधर, शहरी विकास सचिव इसे एनजीटी के आदेश की बाध्यता बताकर विवशता जाहिर कर रहे हैं।


एनजीटी ने इंडियन कौंसिल फॉर एनवाइरो-लीगल एक्शन बनाम नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी एवं अन्य के मामले में एक फरवरी तक गोमुख से हरिद्वार तक पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करने का आदेश दिया था।

एनजीटी के इस आदेश को देखते हुए शासन ने निकाय क्षेत्रों में प्लास्टिक के साथ ही थर्माकोल से बनी वस्तुओं के पूर्ण प्रतिबंध का आदेश भी 13 जनवरी, 2016 को लागू कर दिया था। आदेश में यह भी साफ कहा गया है कि किसी भी प्रकार के अपशिष्ट को गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रवाहित न किया जाए।

कचरे का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए कहा गया है। किसी भी परिस्थिति में नदी किनारे और खुले में शौच करने को अपराध की श्रेणी में रखने को कहा गया है। इसके साथ ही गंगा और उसकी सहायक नदियों के 500 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के अस्थायी और स्थायी निर्माण पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

शासन के इस आदेश को निकाय भी महज खानापूरी ही मान रहे हैं। कारण यह भी है कि इस आदेश का पालन करने के लिए निकायों के पास न तो पर्याप्त अधिकार हैं और न जरूरी मानव संसाधन। चार धाम यात्रा मार्ग पर ही ठोस कचरा निस्तारण की अधिकतर निकायों में व्यवस्था नहीं है।

गंगोत्री में ही डंपिंग यार्ड का मामला अधर में लटका हुआ है। निकायों की इस परेशानी को शासन में बैठे अधिकारी भी स्वीकार कर रहे हैं। शहरी विकास सचिव डीएस गर्बयाल के मुताबिक एनजीटी के आदेश के पालन के लिए कई वैधानिक और व्यवहारिक पहलुओं का भी अध्ययन जरूरी है।

एनजीटी से मांगे जाएंगे दिशा-निर्देश
गोमुख से हरिद्वार तक पॉलिथीन के पूर्ण प्रतिबंध पर अब व्यवहारिकता का पेच फंस गया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के सामने अब शासन यह पैरवी करने की तैयारी भी कर रहा है कि पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध में कई तरह की व्यवहारिक परेशानियां हैं और इन परेशानियों को दूर किए बिना प्रतिबंध को लागू किया जाना मुश्किल है। एनजीटी मामले में 17 फरवरी को सुनवाई करेगी।

दिसंबर माह में एनजीटी ने गंगा की स्वच्छता के मामले में सुनवाई करते हुए प्रदेश सरकार को गोमुख से हरिद्वार तक पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। आदेश में यह भी साफ कर दिया था कि एक फरवरी से यह आदेश लागू माना जाएगा। एनजीटी के आदेश के बाद 13 जनवरी को शासन ने आदेश जारी सभी निकायों को एक फरवरी से पॉलिथीन पर प्रतिबंध का निर्देश जारी किया था।

एक फरवरी को आदेश लागू करने की बारी आई तो शासन को अब मामले के व्यवहारिक पक्ष की दिक्कत नजर आ रही है। शासन के मुताबिक एनजीटी के सामने अब इस पक्ष को रखा जाएगा कि इस आदेश का पूर्ण पालन करना व्यवहारिक रूप में संभव नहीं है।

हरिद्वार से गोमुख तक करीब एक दर्जन शहर और कस्बे हैं। चार धाम यात्रा के दौरान इन कस्बों और शहरों में भारी संख्या में यात्रियों की आवाजाही होती है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति का निरीक्षण करना संभव भी नहीं है।

व्यवहारिक रूप से पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में एनजीटी के सामने इस पक्ष को रखा जाएगा। एनजीटी के आदेश में पूर्ण प्रतिबंध की बात की गई है। पॉलिथीन के व्यापक प्रचलन है और इसका उपयोग लोगों की आदत में शामिल हो गया है। पूर्ण प्रतिबंध के मामले में एनजीटी से दिशा-निर्देश लिए जाएंगे।
- डीएस गर्बयाल, सचिव, शहरी विकास

हरिद्वार में भी नहीं दिखा असर
एनजीटी के आदेश पर ही हरिद्वार में पूर्व में पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। एनजीटी के आदेश के बाद भी कई तरह के कानूनी दाव पेच में मामला उलझा हुआ है। एनजीटी के सख्त रुख को देखते हुए हरिद्वार नगर निगम ने इसकी कोशिश भी की पर मामला पटरी से अब भी उतरा हुआ है।

प्रदेश में पहले से ही प्रतिबंधित है पॉलिथीन
प्रदेश में पॉलिथीन पर प्रतिबंध का मामला नया नहीं है। 2012 में तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक जैन की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रदेश में पॉलिथीन पर पूर्ण प्रतिबंध का फैसला किया गया था। नियमावली न होने के कारण यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इससे पहले प्रदेश में 40 माइक्रोन तक की पॉलिथीन को प्रतिबंधित किया गया था। इस पर सवाल यह उठा था कि उपयोग करने वाले को कैसे पता लगेगा कि पॉलिथीन 40 माइक्रोन तक की है या नहीं।

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