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Dehradun News: न पहचान, न बरामदगी, 16 साल पुराने लूट के मामले में दो आरोपी बरी
Tue, 06 Oct 2026 07:46 PM IST
देहरादून ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
Updated Tue, 06 Oct 2026 07:46 PM IST
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अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिषेक कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने 16 साल पुराने राइस मिल लूट मामले में सहारनपुर के थाना बेहट क्षेत्र के ग्राम रायपुर कलां निवासी छोटू उर्फ शहजाद और कादिर को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, 16 जून 2009 को दोपहर करीब चार बजे विकासनगर में बी.बी राइस मिल मालिक धनंजय गुप्ता के कार्यालय में दो युवक तमंचे के बल पर घुसे। उन्होंने गल्ले से करीब 25 हजार और जेब से एक हजार रुपये लूट लिए तथा जान से मारने की धमकी दी। तीसरा साथी बाहर बाइक लिए खड़ा था। उसी दिन प्रार्थमिक दर्ज की गई। छोटू को 24 मार्च 2010 और कादिर को 15 अप्रैल 2010 को गिरफ्तार किया गया। दोनों पर आरोप तय हुए।
अदालत ने फैसले का आधार बताते हुए कहा कि वादी धनंजय गुप्ता ने जिरह में आरोपियों को पहचानने से इनकार किया। उनके सामने न गिरफ्तारी हुई और न ही शिनाख्त परेड कराई गई। पुलिस गवाहों ने वादी की मौजूदगी में पहचान होने की बात कही, जो वादी के बयान के उलट है। तत्कालीन कोतवाली प्रभारी यशपाल सिंह ने घटनास्थल का नक्शा नजरी वादी की निशानदेही पर बनाने की बात कही लेकिन वादी ने इससे इनकार किया। लूट की रकम भी बरामद नहीं हुई। तीन नक्शा नजरी होने चाहिए थे लेकिन पत्रावली पर केवल एक मिला। एकमात्र स्वतंत्र गवाह वादी भी अभियोजन कथानक का समर्थन नहीं कर सके। इन विरोधाभासों के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषमुक्त किया। बचाव में अधिवक्ता ने पैरवी की, जबकि अभियोजन की ओर से सहायक अभियोजन अधिकारी ने अपना पक्ष रखा।
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अभियोजन के अनुसार, 16 जून 2009 को दोपहर करीब चार बजे विकासनगर में बी.बी राइस मिल मालिक धनंजय गुप्ता के कार्यालय में दो युवक तमंचे के बल पर घुसे। उन्होंने गल्ले से करीब 25 हजार और जेब से एक हजार रुपये लूट लिए तथा जान से मारने की धमकी दी। तीसरा साथी बाहर बाइक लिए खड़ा था। उसी दिन प्रार्थमिक दर्ज की गई। छोटू को 24 मार्च 2010 और कादिर को 15 अप्रैल 2010 को गिरफ्तार किया गया। दोनों पर आरोप तय हुए।
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अदालत ने फैसले का आधार बताते हुए कहा कि वादी धनंजय गुप्ता ने जिरह में आरोपियों को पहचानने से इनकार किया। उनके सामने न गिरफ्तारी हुई और न ही शिनाख्त परेड कराई गई। पुलिस गवाहों ने वादी की मौजूदगी में पहचान होने की बात कही, जो वादी के बयान के उलट है। तत्कालीन कोतवाली प्रभारी यशपाल सिंह ने घटनास्थल का नक्शा नजरी वादी की निशानदेही पर बनाने की बात कही लेकिन वादी ने इससे इनकार किया। लूट की रकम भी बरामद नहीं हुई। तीन नक्शा नजरी होने चाहिए थे लेकिन पत्रावली पर केवल एक मिला। एकमात्र स्वतंत्र गवाह वादी भी अभियोजन कथानक का समर्थन नहीं कर सके। इन विरोधाभासों के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषमुक्त किया। बचाव में अधिवक्ता ने पैरवी की, जबकि अभियोजन की ओर से सहायक अभियोजन अधिकारी ने अपना पक्ष रखा।
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