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निकाय चुनाव 2018: निकायों में न बोर्ड, न प्रशासक, व्यवस्था का सवाल

Thu, 15 Nov 2018 09:57 AM IST
विपिन बनियाल, अमर उजाला, देहरादून
विपिन बनियाल, अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 15 Nov 2018 09:57 AM IST
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nikay chunav 2018 no board in nikay neither administrators
नगर निगम देहरादून - फोटो : file photo

उत्तराखंड बनने के बाद नगर निकायों को पहली बार इस स्थिति का सामना करना पड़ा है, जब वहां न तो बोर्ड अस्तित्व में हैं और न ही प्रशासक नियुक्त हैं। मई में बोर्ड भंग हो जाने के बाद नियुक्त किए गए प्रशासकों का छह महीने का कार्यकाल दस दिन पहले खत्म हो चुका है। उनका कार्यकाल बढ़ाया नहीं गया है। 

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नगर निकाय चुनाव की प्रक्रिया गतिमान है, इसलिए निर्वाचित बोर्ड आने में अभी थोड़ा वक्त है। इन स्थितियों के बीच, बोर्ड के अधिकार वाले वित्तीय मामलों को लेकर नगर निकायों में संकट की स्थिति बन गई है। हालांकि राहत की बात ये है कि चुनाव आचार संहिता के प्रभावी होने के कारण नए कार्यों पर रोक है, लेकिन पूर्व में स्वीकृत मामलों में दिक्कत पेश आ सकती है। वैसे, सरकार का कहना है कि वह इस मामले में विधिक राय ले रही है। जरूरी हुआ, तो प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ाने का आदेश किया जाएगा।

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नगर निकायों की यह है स्थिति
नगर निकायों में तीन मई 2018 को निर्वाचित बोर्ड भंग हो चुके हैं। इससे पहले, ही चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और छह महीने के लिए सरकार ने प्रशासकों की नियुक्ति कर दी। अक्तूबर में अधिसूचना हुई, लेकिन चुनाव प्रक्रिया के खत्म हो जाने से पहले ही प्रशासकों का छह महीने का कार्यकाल चार नवंबर 2018 को पूरा हो गया। तकनीकी तौर पर देखें तो निकायों में पिछले दस दिन से न तो बोर्ड है और न ही प्रशासक। 18 नवंबर को मतदान होना है और 20 नवंबर से मतगणना। इसके बाद जाकर नए निर्वाचित बोर्ड निकायों को मिल पाएंगे। इसमें एक सप्ताह से ज्यादा का समय लगना है।
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इस तरह की है सामने दिक्कत
नगर निकायों में वित्तीय कार्यों के लिए नगर आयुक्त/अधिशासी अधिकारियों को एक निश्चित बजट रिलीज करने का अधिकार होता है। नगर निगम की बात करें, तो नगर आयुक्त 50 हजार रुपये तक बजट अपने स्तर पर रिलीज कर सकता है। इससे ज्यादा के बजट को रिलीज करने का अधिकार बोर्ड में निहित है। नगर निकाय में प्रशासक की तैनाती के बाद बोर्ड की सारी शक्तियां उसमें निहित हो जाती हैं। ऐसे में बोर्ड के अधिकार क्षेत्र वाले वित्तीय कार्यों को पूरा कराने में दिक्कत पेश आ सकती है। हालांकि आचार संहिता के कारण निकायों में इस वक्त ज्यादातर चुनाव का कार्य ही किया जा रहा है।

हम इस मामले में विधिक राय ले रहे हैं। प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ाने का निर्णय इसलिए नहीं लिया गया, क्योंकि चुनाव आचार संहिता प्रभावी है और बहुत जल्द ही निर्वाचित बोर्ड निकायों में गठित हो जाएंगे। फिर भी, विधिक राय में यदि इसकी जरूरत की बात निकलकर आई, तो हम आदेश जारी करेंगे।

- मदन कौशिक, नगर विकास मंत्री, उत्तराखंड

तकनीकी तौर पर यह एक विचित्र सी स्थिति है, जबकि निकायों में न बोर्ड हैं और न ही प्रशासक। कामकाज पर इसका असर पड़ रहा है। हमने कोर्ट की शरण इसलिए नहीं ली, क्योंकि कुछ ही दिनों में चुनाव के बाद सभी जगह निर्वाचित बोर्ड गठित हो जाएगा। मगर तकनीकी सवाल अपनी जगह खड़ा है।
- नवप्रभात, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तराखंड

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