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जलवायु परिवर्तन के चलते उत्तराखंड समेत तमाम हिमालई राज्यों में विकसित हो रहे नए भूस्खलन जोन

Fri, 10 Dec 2021 12:00 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Fri, 10 Dec 2021 12:00 AM IST
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New landslide zones developing in Himalayan states due to climate change
उत्तराखंड समेत देश के तमाम हिमालीय राज्यों में साल दर साल बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं और इनमें जन-धन की हानि के मद्देनजर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की टीम उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में नए सिरे से भूस्खलन जोन चिन्हित करने में जुट गई है। यह टीम उन भूस्खलन जोन को भी चिन्हित कर रही है जो हाल के वर्षों में सक्रिय हुए है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में नए भूस्खलन जोन चिन्हित करने में जुटे वैज्ञानिकों का मानना है कि हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन में आए व्यापक बदलाव के चलते पर्वतीय इलाकों में कम समय में बहुत अधिक बारिश हो रही है जो भूस्खलन का एक बड़ा कारण है।
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उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के ही आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य में 84 ऐसे भूस्खलन जोन चिन्हित किए गए हैं जो आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ऑल वेदर रोड परियोजना के 150 किलोमीटर क्षेत्र में ही 60 ऐसे जोन चिन्हित किए गए हैं, जो भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विक्रम गुप्ता के मुताबिक फिलहाल पहले चरण में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में नए भूस्खलन जोन का अध्ययन किया जा रहा है। भूस्खलन का अध्ययन करने में राज्यों के आपदा प्रबंधन विभाग के पास मौजूद डाटा का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
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उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, सिक्किम, हिमाचल, जम्मू कश्मीर ज्यादा संवेदनशील
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की मानें तो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी राज्यों में नीलगिरी की पहाड़ियाें अलावा महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में तमाम ऐसे इलाके हैं, जो भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में 12 प्रतिशत जमीन ऐसी है जो भूस्खलन के लिहाज से काफी संवेदनशील है।
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220 फीट प्रति सेकंड होती है मलबे के नीचे गिरने की रफ्तार
वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि दुनिया में जितने भी भूस्खलन होते हैं, उनमें से ज्यादातर भूस्खलन की घटनाओं में मलबे के नीचे गिरने की गति 220 फीट सेकंड होती है जो अपने आप में बहुत अधिक है। वैज्ञानिकों की मानें तो भूस्खलन के दौरान गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने की वजह से मलबा तेजी से नीचे गिरता है जो बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का कारण बनता है।
पर्वतीय राज्यों में अंधाधुंध विकास कार्य व वनों की कटाई से बढ़ा खतरा
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा ज्यादातर पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन का बड़ा कारण जहां जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय होने वाली बहुत अधिक बारिश है। वहीं पर्वतीय राज्यों में अंधाधुंध तरीके से कराए जा रहे विकास कार्य और वनों की कटाई भी भूस्खलन का बड़ा कारण बन रही है। पर्वतीय राज्यों में जलाशयों में पानी से रिसाव की कई बार भूस्खलन का कारण बन रहे हैं।

भारत समेत पूरी दुनिया में पिछले कई दशक से जलवायु परिवर्तन में आए के चलते हिमालयी राज्यों के पर्वतीय इलाकों में कम समय में बहुत अधिक बारिश की वजह से भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। जो चिंता का विषय है। फिलहाल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में नए भूस्खलन जोन चिन्हित करने को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। जिसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर यह संभावनाएं तलाशी जाएंगी कि भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कैसे कम किया जा सकता है। फिलहाल तमाम पहलुओं को ध्यान में रखकर नए भूस्खलन जोन चिन्हित किए जा रहे हैं।
- डॉ. विक्रम गुप्ता, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी
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