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राष्ट्रीय युवा दिवस: खामोशी से 'द साइलेंट बिस्ट्रो' में सपने साकार कर रहे युवा, इशारों में ही समझते हैं बात

Mon, 12 Jan 2026 01:59 PM IST
रेनू सकलानी खुशी रावत, अमर उजाला, देहरादून
खुशी रावत, अमर उजाला, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Mon, 12 Jan 2026 01:59 PM IST
सार

राष्ट्रीय युवा दिवस पर राजधानी देहरादून के द साइलेंट बिस्ट्रो कैफे चलाने वाले युवाओं को कहानी से हम आपको रूबरू करा रहे हैं। यहां काम करने वाले 10 में 7 कर्मचारी मूक-बधिर हैं।

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National Youth Day Special Deaf mute youth run a cafe in Dehradun The Silent Bistro
मूक बधिर स्टाफ से साइन लैंग्वेज में बात करतीं तनिष्का - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

राजधानी देहरादून के सहस्रधारा क्षेत्र में स्थित द साइलेंट बिस्ट्रो एक ऐसा कैफे है, जिसे मूक-बधिर युवा चला रहे हैं जो सिर्फ इशारों में ही बात समझते हैं। तमाम चुनौतियों के बीच ये दिव्यांग अपने हौसलों से न सिर्फ अपना भविष्य संवार रहे हैं, बल्कि समाज को भी नई सोच दे रहे हैं। इस कैफे की शुरुआत सितंबर 2025 में हुई।

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कैफे में काम करने वालीं ट्रांसलेटर तनिष्का ने बताया यहां काम करने वाले 10 में 7 कर्मचारी मूक-बधिर हैं। इनमें नेपाल, हिमाचल, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के लोग शामिल हैं। इस कैफे में परोसे जाने वाले व्यंजन भले ही सामान्य दिखें लेकिन इन्हें बनाने से लेकर ग्राहकों की मेज तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की कहानी कहती है।
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संकेतों की भाषा बने संवाद की पहचान
कैफे में काम करने वाले मूक-बधिर युवा चाहते हैं कि भारत में अधिक से अधिक लोग साइन लैंग्वेज सीखें, ताकि उनके जैसे लोगों को रोजमर्रा के जीवन में आसानी हो सके। यहां काम कर रहीं समरीन बताती हैं कि विदेशी ग्राहक अक्सर साइन लैंग्वेज समझ लेते हैं, जिससे उनसे संवाद सहज हो जाता है। वहीं भारत में अभी गिने-चुने लोग ही इस भाषा को बोल और समझ पाते हैं, जिसके कारण कई बार उन्हें खुद को अलग महसूस करना पड़ता है। समरीन का कहना है कि अगर साइन लैंग्वेज को सामान्य संवाद का हिस्सा बनाया जाए, तो मूक-बधिर लोग भी समाज में और सहज महसूस कर सकेंगे।
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पूरी दुनिया घूमने का है सपना : समरीन
इस कैफे में कार्यरत देहरादून की 23 वर्षीय समरीन का पूरी दुनिया घूमकर अलग-अलग देशों में काम करने का सपना है। वह बताती हैं कि उन्होंने बजाज इंस्टीट्यूट से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई के ताज होटल में अपनी इंटर्नशिप पूरी की। इसके बाद देहरादून के दो निजी रेस्टोरेंट में काम किया लेकिन संवाद में दिक्कत आने के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ी।
बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अंततः इस कैफे से जुड़ीं। वह पिछले तीन महीनों से यहां काम कर रहीं हैं। समरीन बताती हैं कि यहां काम करना उन्हें बेहद पसंद है और जब लोग उन्हें देखकर संवाद करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अच्छा लगता है। वह कहती हैं जीवन बेहद खूबसूरत है और इसे खुलकर जिएं।

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हर रोज मिलती है प्रेरणा : गौरीशंकर
के असिस्टेंट मैनेजर टिहरी गढ़वाल के रहने वाले गौरीशंकर बताते हैं कि वह बीते महीने से यहां काम कर रहे हैं। वह इससे पहले कई जगह काम कर चुके हैं लेकिन उन्हें इस कैफे की थीम रोचक लगती है। वह बताते है हर रोज कैफे में कदम रखते ही उन्हें बेहद प्रेरणा मिलती है और अपने संघर्ष छोटे लगने लगते हैं।

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एक बहन समझती है इशारे तो दूसरी समझाती है। बहन आयुषी से साइन लैंग्वेज में बात करतीं तनिष्का - फोटो : अमर उजाला

एक बहन समझती है इशारे, दूसरी समझाती है
कैफे में काम करने वाली आयुषी और तनिष्का सगी बहनें हैं। दोनों मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली हैं। 23 वर्षीय आयुषी मूक-बधिर हैं, वहीं 21 वर्षीय तनिष्का, आयुषी और यहां काम कर रहे अन्य स्टाफ के बीच संवाद की कड़ी हैं। कंप्यूटर में गहरी रुचि रखने वाली आयुषी ने सात वर्ष की उम्र से बजाज इंस्टीट्यूट में शिक्षा ली। इसके बाद उन्हें चंडीगढ़ की एक निजी कंपनी में नौकरी मिली, लेकिन परिस्थितियों के चलते वह देहरादून आई और 'द साइलेंट बिस्ट्रो' से जुड़कर अपने सपनों को दोबारा दिशा दी। आयुषी कहती हैं कि चुनौतियां आती हैं, लेकिन वह अपने जैसे अन्य युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं।

यदि वह मूक-बधिर न होतीं तो आज एक शिक्षक होतीं, उन्होंने हार नहीं मानी है और उनका सपना देश-विदेश में बच्चों को पढ़ाने का है। आयुषी की खामोशी को शब्द देती हैं उनकी बहन तनिष्का, जो बचपन से इशारों की भाषा समझती आई हैं। आयुषी ने ही उन्हें साइन लैंग्वेज की गहराई से परिचित कराया और आज तनिष्का इसमें दक्ष होकर कैफे में ग्राहकों और स्टाफ के बीच संवाद को सहज बना रही हैं। तनिष्का कहती हैं कि इन युवाओं के साथ काम करना उनके लिए एक अलग और खूबसूरत अनुभव है।

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