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राष्ट्रीय खेल दिवस 2019: फुटबाल, हॉकी, कुश्ती व कई इंडोर गेम्स के साथ नहीं हो पाया न्याय

Thu, 29 Aug 2019 10:23 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal गौरव ममगाईं, अमर उजाला, देहरादून
गौरव ममगाईं, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 29 Aug 2019 10:23 AM IST
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National sports day 2019 justice could not be done with these games in uttarakhand
प्रतीकात्मक - फोटो : social Media

किसी भी देश या राज्य की प्रतिष्ठा में खेलों का अहम योगदान होता है। इसी को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित करता है। युवाओं को इसके प्रति आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है। बात फुटबाल की हो या कुश्ती या कबड्डी की।

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इन परंपरागत खेलों के प्रति देहरादून के लोगों की दीवानगी 1990 के दशक से पहले खूब दिखती थी। लेकिन वह नजारा अब देखने को नहीं मिलता। बैडमिंटन, एथलेटिक्स, ताइक्वांडो, कराटे में हमने जरूर पहचान बनाई है। राज्य में खेलों की स्थिति पर हमने क्या खोया और क्या पाया इस पर एक नजर।
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फुटबाल : वर्ष 1940 से करीब 1990 के दशक तक देहरादून फुटबाल का हब रहा। यहां राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट भी हुआ करते थे। नेशनल टीम में देहरादून के खिलाड़ियों का खास स्थान हुआ करता था। लेकिन आज देहरादून फुटबाल से गायब नजर आता है।
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हॉकी :राष्ट्रीय खेल हॉकी में प्रदेश का कोई खास स्थान नहीं है। वर्तमान में यह उपेक्षा का शिकार भी है। इसे प्रोत्साहन देने के लिए कोई खास पहल नजर नहीं आ रही है। यही वजह है कि आज हॉकी में ज्यादा खिलाड़ी जुड़े हुए नहीं है।

कुश्ती :कुश्ती में भले ही विश्व में भारत का डंका बज रहा हो, लेकिन उत्तराखंड में कुश्ती हाशिए पर है। जबकि तीन से चार दशक पहले तक देहरादून में कुश्ती के प्रति काफी दीवानगी देखी जाती थी। लेकिन, हम इस परंपरागत खेल में अब कोई योगदान नहीं दे पा रहे हैं।
एथलेटिक्स : एथलेटिक्स में प्रदेश के खिलाड़ियों ने समय-समय पर दमखम दिखाया है। इसमें देहरादून के महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज के खिलाड़ियों का अहम योगदान रहा है। रुद्रप्रयाग, चमोली जैसे दुर्गम क्षेत्रों की प्रतिभाओं ने भी लोहा मनवाया है।

बैडमिंटन : बैडमिंटन में राज्य ने कुहू गर्ग, लक्ष्य सेन, अदिति भट्ट, नियति, ध्रुव व कई अन्य खिलाड़ी पहचान बना चुके हैं। कुहू और लक्ष्य ने कई बड़े खिताब में भी लोहा मनवाया है।
कबड्डी : कबड्डी को परंपरागत खेल माना जाता है। गांवों में बच्चा बचपन से कबड्डी खेलकर बड़ा होता है। लेकिन इसके साथ न्याय नहीं हो पाया है। यह ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।

ताइक्वांडो : ताइक्वांडो में प्रदेश का प्रदर्शन संतोषजनक रहा है। इसे प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है, जिससे दस साल की उम्र से बच्चे इस खेल से जुड़ने लगे हैं और नेशनल व इंटरनेशनल खेलों में पदक भी जीत रहे हैं।
शूटिंग : निशानेबाजी में उत्तराखंड ने पहचान जरूर बनाई है। जसपाल राणा का इसमें मुख्य योगदान रहा है। हाल ही में देवांशी राणा ने भी विश्व जूनियर प्रतियोगिता में गोल्ड जीता है।
इंडोर खेल : टेबल टेनिस, तैराकी, तीरंदाजी, तैराकी, जिम्नास्टिक, साइकिलिंग व कई अन्य खेलों में निराशाजनक प्रदर्शन रहा है। जिम्नास्टिक, साइकिलिंग जैसे कई खेल तो ऐसे हैं जिन्हें प्रोत्साहन देने के लिए अभी तक प्रयास तक नहीं हुए हैं।
 

हॉकी के जादूगर को समर्पित खेल दिवस 

भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्मदिवस 29 अगस्त को आता है। उनके सम्मान में उनका जन्मदिवस को खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्वभर में ध्यानचंद को ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से जाना जाता है। ध्यानचंद ने भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाया था। उनकी हॉकी में जादूगरी का नतीजा था कि विदेशी टीम के खिलाड़ी ध्यानचंद की हॉकी को लेकर कई बार शिकायत करते थे। उनका आरोप रहता था कि उनकी हॉकी में ‘चुंबक’ है, लेकिन जांच में कुछ नहीं निकलता था।

ये हैं चुनौतियां
-बजट में कटौती व देरी से जारी होना। कोचों की कमी।
-खिलाड़ियों को खेल किट उपलब्ध न होना, इससे खिलाड़ी हतोत्साहित होता है।
-सार्वजनिक मंचों से मंत्री घोषणाएं तो करते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद उसका वजूद नहीं रहता।
-पैरालंपिक के लिए सरकारी स्तर पर कोई ट्रेनिंग या अन्य सुविधा नहीं है।
-हॉकी, फुटबाल, कुश्ती जैसे खेलों को बढ़ावा देने के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं।
-राज्य और जिला खेल एसोसिएशन का उदासीन रवैया भी जिम्मेदार।

बजट कम होता गया :  वर्ष 2016-17 के बजट पर नजर डालें तो हर साल बजट कम किया जा रहा है। वर्ष 2016-17 के बजट का तीन फीसद से भी कम बजट इस वर्ष जारी हुआ है। हालांकि, पिछले वर्षों में अधिक बजट जारी होने के पीछे निर्माण कार्यों के होने का कारण बताया जा रहा है

बजट की स्थिति
वर्ष   स्वीकृत बजट   खर्च
2019-20  2561.75   496.16
2018-19  4661.39  4092.29
2017-18  4024.94   3595.21
2016-17  24183.41   23635.64
(नोट : धनराशि लाख रुपये में)

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