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दुर्गम राहों को आसान कर माना एवरेस्ट विजेता
राजजात से लौटकर अंशुल डांगी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 09 Sep 2014 02:21 PM IST
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उत्तरकाशी स्थित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग(निम) यूं तो पर्वतारोहण और साहसिक खेलों के लिए जाना जाता है, लेकिन नंदा राजजात यात्रा में इस संस्थान ने अहम भूमिका निभाई।
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कठिन रास्तों को बनाया चलने लायक
दो बार एवरेस्ट विजेता सूबेदार मेजर तेजपाल सिंह नेगी की अगुवाई में संस्थान की साहसी टीम ने यात्रा के सबसे दुर्गम और कठिन रास्तों को कुछ ही दिनों में चलने लायक बना दिया। इसी टीम का जज्बा था कि खड़ी पहाड़ी को भी यात्रा बिना मुश्किल पार कर गई।
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नंदा राजजात यात्रा के दूसरे निर्जन पड़ाव बेदनी बुग्याल में तेजपाल सिंह नेगी के साथ 130 कर्मचारी रास्ते दुरुस्त करने में जुटे थे। बातचीत में पता चला कि वे निम की टीम के इंचार्ज हैं और रूपकुंड, जोरागली और शिला समुद्र के रास्ते को सही करने का जिम्मा उन्हीं पर है।
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देहरादून के बंजारावाला निवासी सेना मेडल और विशिष्ठ सेना मेडल से सम्मानित तेजपाल सिंह मूल रूप से रुद्रप्रयाग के उर्खोली के रहने वाले हैं और सेना में सूबेदार मेजर के पद पर हैं। बीते डेढ़ साल से वे डेपुटेशन पर निम में तैनात हैं।
उन्होंने बताया कि 16 मई 2007 और 26 मई 2012 को एवरेस्ट की चढ़ाई की थी, लेकिन यात्रा मार्ग की मरम्मत उससे भी भारी चुनौती है। जुलाई के मध्य में पहली बार निम की टीम ने यात्रा रूट की रेकी की थी।
टीम ने हिम्मत नहीं हारी
टीम ने 10 अगस्त को बेदनी में डेरा डाल दिया था। 15000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड की खड़ी पहाड़ी पर रास्ता ही नहीं था। लेकिन, 18 से 20 दिन की कड़ी मेहनत के बाद तीन किलोमीटर की चढ़ाई को चलने लायक बनाकर ही टीम ने दम लिया।
इस दौरान बारिश तो कभी भूस्खलन से काम बार-बार प्रभावित हुआ। विषम परिस्थितियों के बीच कई सदस्य बीमार भी पड़े, लेकिन टीम ने हिम्मत नहीं हारी और यात्रा से पहले पूरा रास्ता बनाकर ही दम लिया। जूरागली और शिलासमुद्र का रास्ता बनाने में भी काफी परेशानी हुई।
यात्रा के दौरान निम ने यात्रियों के लिए टैंट और भोजन की व्यवस्था भी की। बेदनी में लोगों की संख्या अधिक होने पर निम के सदस्य आमोद पंवार, धीरज, सोभन, आकाश और शिवराज के साथ तेजपाल सिंह ने रात खुले में काटी और भगुवावासा में भोजन बांटने का काम भी खुद करते नजर आए।