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पहाड़ को आबाद करने बुला रही भगवती नंदा
कोटी (चमोली) से सुधाकर भट्ट
Updated Fri, 22 Aug 2014 11:47 PM IST
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यात्रा के चौथे पड़ाव सेम के बाद से ही लोक की नंदा अब ऊंचे पहाड़ों की ओर बढ़ चली है। दूर-दराज और एक-दूसरे से छिटके गांवों की छंतोलियां नंदा की इस यात्रा में शामिल हो रही हैं। इसी के साथ यात्रा का स्वरूप और बड़ा होता जा रहा है।
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नौटी से लेकर कोटी तक का 50 किमी का सफर तय कर रही नंदा अब तक इन बीच के गांवों की दुर्दशा, बदहाली और अपनी जड़ से टूटने की त्रासदी भी उकेर रही है। बिखर रहे इन गांवों को नंदा वापस बुला रही है। नौटी से लेकर कोटी तक के कई दर्जन गांवों से होकर यात्रा गुजरी है। हर गांव की लगभग-लगभग एक जैसी तस्वीर है।
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गांव खाली हो रहे हैं। पहाड़ शहर की ओर जा रहा है। निचले इलाके के गांव कहीं पानी, कहीं सड़क तो कहीं जंगली जानवरों से परेशान होकर खाली हो रहे हैं। अध्यात्म और धार्मिक रीति-रिवाजों की डोर में बंधे गांव अपने जीने का सहारा खोजते हुए दिखते हैं।
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सुकून इस बात है कि खेत बंजर नहीं दिखते। खेतों में कौंणी, मंड़वा, धान, झंगोरा और चौलाई की फसल लहलहाती दिख रही है पर अधिकतर गांवों में आधे से ज्यादा घरों में ताले लटके मिलते हैं।
वर्षों बाद पहाड़ के गांव हुए गुलजार
गांवों में बुजुर्ग महिलाओं या बहू-बेटियों की संख्या ज्यादा दिखती है। ऐसे में 14 साल बाद एक बार फिर से कैलास यात्रा के निकली नंदा इन गांवों को आबाद कर रही है। दिल्ली, मुंबई और बाहर विदेशों में रह रहे गांव के लोग जात के नाम पर ही सही, घर पहुंचे हैं।
घरों में रंग-रोगन हुआ है। वर्षों से बंद पड़े दरवाजे खोले गए हैं। खेत-खलियानों की सुध ली गई है और नंदा से ईष्ट की कामना की गई। लोक की नंदा की यह ताकत है, जो यात्रा में दिखाई दे रही है। नंदा जिस गांव से गुजरती है, उस गांव में घरों के बंद दरवाजे खुल जाते हैं।
नंदा की इस यात्रा में शामिल अन्य देवी-देवताओं, यात्रियों के स्वागत के लिए लोग सड़क और गांव की सीमा पर जमा हो जाते हैं। गांव की महिलाएं मांगल गीत गाकर नंदा को अपना दुख-दर्द सुना रही हैं।
अच्छे ससुराल की कामना कर रही हैं। इस बहाने अपनी कठिन जिंदगी में थोड़ी राहत का अहसास है। नंदा की यह यात्रा पलायन से उजड़ रहे गांवों को फिर से बसाने की भी एक यात्रा है। आध्यात्मिक यात्रा का यह लोक स्वरूप गांवों से दूर हो रहे लोगों को वापस खींच रहा है।
घरों में रंग-रोगन हुआ है। वर्षों से बंद पड़े दरवाजे खोले गए हैं। खेत-खलियानों की सुध ली गई है और नंदा से ईष्ट की कामना की गई। लोक की नंदा की यह ताकत है, जो यात्रा में दिखाई दे रही है। नंदा जिस गांव से गुजरती है, उस गांव में घरों के बंद दरवाजे खुल जाते हैं।
नंदा की इस यात्रा में शामिल अन्य देवी-देवताओं, यात्रियों के स्वागत के लिए लोग सड़क और गांव की सीमा पर जमा हो जाते हैं। गांव की महिलाएं मांगल गीत गाकर नंदा को अपना दुख-दर्द सुना रही हैं।
अच्छे ससुराल की कामना कर रही हैं। इस बहाने अपनी कठिन जिंदगी में थोड़ी राहत का अहसास है। नंदा की यह यात्रा पलायन से उजड़ रहे गांवों को फिर से बसाने की भी एक यात्रा है। आध्यात्मिक यात्रा का यह लोक स्वरूप गांवों से दूर हो रहे लोगों को वापस खींच रहा है।