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उत्तराखंड की राजधानी में दम तोड़ रही मनरेगा
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 14 Aug 2015 12:38 PM IST
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दून में मनरेगा के तहत चालू वित्तीय वर्ष में केवल दो परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला है।
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वहीं, इस साल कुल 603 परिवारों के जॉब कार्ड बन पाए हैं। यह चौंकाने वाला तथ्य राजधानी में मनरेगा के तहत दिए जा रहे रोजगार अवसर की पड़ताल में सामने आया है।
मनरेगा में बेरोजगारों की उपेक्षा का मामला कांग्रेस शासित प्रदेश में इसलिए भी अहम है कि यह कांग्रेस का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है और भाजपा इस पर हमेशा से सवाल उठाती रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो संसद में यहां तक कह दिया था कि मनरेगा कांग्रेस की असफलताओं का स्मारक है।
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दरअसल, ग्रामीण क्षेत्र के कई बेरोजगारों ने अमर उजाला से संपर्क करके बताया था कि मनरेगा के तहत रोजगार नहीं दिया जा रहा है। अमर उजाला रिपोर्टर बिशन सिंह बोरा की पड़ताल में शिकायत सही पाई गई। जो तथ्य पड़ताल में सामने आए हैं, ज्यों के त्यों प्रस्तुत किए जा रहे हैं...
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विश्व बैंक ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को दुनिया का सबसे बड़ा लोक निर्माण कार्यक्रम आंका है, जो देश की लगभग 15 फीसदी जनसंख्या को सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर रही है, लेकिन उत्तराखंड में मनरेगा दम तोड़ती नजर आ रही है।
उत्तराखंड में वर्ष 2008 में मनरेगा शुरू हुई। दून में तब से अब तक 77,155 परिवार पंजीकृत हैं। इतने ही लोगों के जॉब कार्ड बने हैं। इसमें एससी परिवारों की संख्या 17,155 और एसटी परिवारों की संख्या 18,427 है। हाल ही कुछ बेरोजगारों ने इसके लिए धरना-प्रदर्शन करके जिम्मेदार अधिकारियों को ज्ञापन दिया था।
बावजूद हाल वैसे ही बने हुए हैं। केवल दो परिवारों को 100 दिन का रोजगार देने के सवाल पर सुशील मोहन डोभाल, जिला विकास अधिकारी, देहरादून का तर्क है कि बरसात में लोग काम के लिए कम आते हैं। दिसंबर, जनवरी और फरवरी में जॉब कार्ड के लिए अधिक आवेदन आते हैं।
इस साल 603 लोगों को मिले जॉब कार्ड कम नहीं हैं, असल में जिन लोगों का एक बार जॉब कार्ड बन जाता है, वह पांच साल तक मान्य होता है। बरसात का मौसम तो जुलाई से शुरू होता है, इससे पहले लोग काम के लिए क्यों नहीं आए, इस सवाल का डोभाल कोई तार्किक जवाब नहीं दे सके।
नहीं बन रहे जॉब कार्ड
विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के चलते बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। दून सहित अन्य जनपदों में योजना शुरू होने (वर्ष 2008) के बाद से अब तक मात्र 6 लाख 7 हजार 811 लोगों के जॉब कार्ड बन पाएं हैं। जबकि बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में गांवों से पलायन कर रहे हैं।
जॉब कार्ड के लिए यहां करें आवेदन
मनरेगा के तहत रोजगार पाने के इच्छुक व्यक्ति विकासखंड कार्यालय या ग्राम पंचायत में आवेदन कर सकते हैं। जिला विकास अधिकारी सुशील मोहन डोभाल के मुताबिक आवेदन के 15 दिन के भीतर जॉब कार्ड बन जाता है।
15 दिन में देना होता है रोजगार
जॉब कार्ड बनने के बाद 15 दिन में संबंधित व्यक्ति को रोजगार देना होता है। इसके लिए फार्म नंबर छह भरकर दे सकते हैं या सादे कागज पर भी रोजगार के लिए आवेदन कर सकते हैं।
156 रुपए से 161 रुपए हुई मजदूरी
मनरेगा के तहत इस वर्ष से मजदूरी 156 रुपए से बढ़ाकर 161 रुपए की गई है। इसमें एक परिवार को एक साल में 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है।
अब तक बने जॉब कार्ड
चमोली, चंपावत, टिहरी, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, देहरादून, नैनीताल, पौड़ी, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में अब तक 607811 जॉब कार्ड बने हैं।
यहां करें शिकायत
जॉब कार्ड बनाने में ग्राम पंचायत स्तर या बीडीओ कार्यालय से आनाकानी की जा रही है तो जिला विकास अधिकारी कार्यालय एवं मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय में शिकायत कर सकते हैं।
रोजगार की गारंटी, नहीं मिल रहा काम
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत रोजगार की गारंटी है, लेकिन ग्रामीणों को काम नहीं मिल रहा। योजना का भुगतान ऑनलाइन होते ही इसकी रफ्तार थम गई है।
उत्तराखंड में इस वित्तीय वर्ष में अब तक 74 हजार 253 लोगों को काम मिला है। जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में चार लाख 37 हजार 302 लोगों के जॉब कार्ड बने और चार लाख 33 हजार 86 लोगों को काम मिला। उप कार्यक्रम अधिकारी मनरेगा योगेंद्र कुमार बताते हैं कि ऑनलाइन भुगतान से कुछ जनप्रतिनिधियों को यह लगता है कि उनके अधिकार छीन लिए गए हैं।
भुगतान की ऑनलाइन प्रक्रिया अपनाए जाने से श्रमिकों के भुगतान में देरी हो रही है। स्पेलिंग की गलती होते ही भुगतान रुक जाता है, वहीं इसके तहत मिलने वाली मजदूरी भी बहुत कम है।
- सुनीता बिष्ट, ग्राम प्रधान अस्थल
ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी योजना के प्रति गंभीर नहीं हैं। उनसे भुगतान का अधिकार छिनते ही काम के इच्छुक लोगों को काम के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है।
- विमलेश देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य हर्रावाला
मनरेगा में मजदूरी बहुत कम है। सामान्य तौर पर तीन से चार सौ रुपये मजदूरी है। ऐसे में खाकर मजदूरी करने वाले लोग मनरेगा में रुचि नहीं दिखाते हैं। गांवों का शहरीकरण होना भी एक मुख्य कारण है।
- अभिषेक पंत, प्रधान, डांडा लखौंड
दून में मात्र दो परिवारों को सौ दिन के काम की वजह यह है कि सब आनलाइन होने से शुरूआत में कुछ दिक्कतें आ रही हैं, भुगतान का अधिकार छिनने से कुछ प्रधान भी रुचि नहीं ले रहे। वहीं इसके तहत मिलने वाली मजदूरी भी बहुत कम है। ऐसे में घर के आस-पास के लोग कुछ दिन काम करते हैं फिर छोड़ देते हैं।
- आलोक कुमार पांडे, मुख्य विकास अधिकारी दून