उत्तराखंड में होंगे महाभारत के वट वृक्ष के दर्शन
हजारों वर्ष पहले जिस वट वृक्ष के नीचे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) संभाल रहा है।
ज्योतिसर, कुरुक्षेत्र में स्थित इस वट वृक्ष के ट्रीटमेंट की सारी प्रक्रिया विज्ञानियों ने पूरी कर ली है। अब विज्ञानियों ने इस वट वृक्ष की एक शाखा उत्तराखंड में स्थापित करने का इरादा जताया है। पौराणिक महत्व के इस वट वृक्ष की यहां स्थापना होने के बाद चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी इसके दर्शन कर सकेंगे।
जिस प्रजाति (फाइसस बेंगालेंसिस) का यह वट वृक्ष है उस प्रजाति के कुछ बरगद उत्तराखंड में भी हैं, ऐसे में कुरुक्षेत्र से लाई जाने वाली शाखा यहां आसानी से तैयार हो जाएगी। महाभारत काल से जुड़ने के कारण इस वट वृक्ष का विशेष पौराणिक महत्व है।
देहरादून लाई जाएगी वृक्ष की एक शाखा
एफआरआई के समूह समन्वयक (अनुसंधान) डॉ. एनएसके हर्ष का कहना है कि गीता के उपदेश से जुड़े होने के कारण लोग इस वटवृक्ष की पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र विकास प्राधिकरण के साथ मिलकर वटवृक्ष का ट्रीटमेंट किया गया है।
विज्ञानियों के अनुसार, कुरुक्षेत्र के वट वृक्ष की एक शाखा काटकर यहां लाई जाएगी, जिसे चयनित स्थान पर रोपा जाएगा। हालांकि अभी स्थान का चयन नहीं किया गया है।
संगमरमर के चबूतरे से नहीं उभर पा रही थी जड़ें
विज्ञानियों ने बताया कि कुरुक्षेत्र में वट वृक्ष की स्थिति बहुत खराब हो गई थी। चारों तरफ संगमरमर का चबूतरा बनने के कारण जड़ें उभर नहीं पा रही थीं। टहनियों में भारी-भरकम घंटे टांगने, रस्सियां और तार बांधने, कीलें गाड़ने के कारण इसकी शाखाएं खराब हो रही थीं।
पिछले साल से एफआरआई के विज्ञानियों ने इसका ‘ट्रीटमेंट’ किया। सांसद रतनलाल कटारिया ने मार्च में इस पर संसद में सवाल भी उठाया था। ‘ट्रीटमेंट’ के बाद वटवृक्ष की शाखों पर आए ‘जख्म’ ठीक हो गए हैं। ज्योतिसर परिसर में तीन वट वृक्ष हैं। एक मुख्य है और दो इसकी शाखाएं हैं।