लोकसभा चुनाव 2019: इन दो कद्दावर नेताओं के बिना बीजेपी के सामने है पांचों सीट जीतने की बड़ी चुनौती
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उत्तराखंड राज्य गठन के बाद यानी 19 साल में ये पहला मौका है जब भाजपा के ये दो दिग्गज मैदान में नहीं है। भाजपा के इन दो कद्दावर नेताओं जनरल खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी के बिना भाजपा को पांचों सीटें जीतने के पिछले रिकॉर्ड को दोहराने की बड़ी चुनौती है। दरअसल, दोनों दिग्गजों के चुनाव लड़ने से इंकार करने पर पार्टी को उनके संसदीय क्षेत्रों में नए चेहरे उतारने पड़े हैं ।
जनरल खंडूडी गढ़वाल का बड़ा नाम हैं, जबकि कोश्यारी की कुमाऊं में मजबूत पकड़ है। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि दोनों ही दिग्गज चुनाव मैदान मेें भले ही न उतरे हों, मगर उनकी मर्जी के ही उम्मीदवार उतारे गए हैं।
गढ़वाल की सियासत में जनरल खंडूड़ी की भूमिका अहम रही है। चाहे विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा खंडूड़ी को फ्रंट में रखकर भाजपा रणनीति तय करती थी। खंडूड़ी के इस बार चुनाव लड़ने से इंकार के बाद पार्टी सैन्य पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी को तलाश रही थी, लेकिन एकाएक जनरल के बेटे मनीष खंडूड़ी के कांग्रेस का दामन थामने से सारे समीकरण बदले।
उन्हें मनाने की हरसंभव कोशिश नाकाम रही। आखिरकार जनरल के शिष्य माने जाने वाले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत को पौड़ी से टिकट देना पड़ा। अब भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है कि जनरल को चुनाव प्रचार में कैसे सक्रिय रखा जाए? खंडूड़ी का प्रभाव पौड़ी ही नहीं बल्कि अन्य सीटों पर भी है। उधर, कुमाऊं में कोश्यारी का बड़ा रुतबा है। पार्टी के भारी दबाव के बावजूद वे चुनाव नहीं लड़ने के अपने एलान पर अडिग रहे।
राजपूत मतदाताओं में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। जातीय समीकरणों को ध्यान में रख प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को कोश्यारी ने अपना विकल्प चुना। खटीमा से तीन बार के विधायक और कोश्यारी के करीबी माने जाने वाले पुष्कर सिंह धामी रेस से बाहर हो गए। मोदी लहर में वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव हार चुके भट्ट के लिए नैनीताल क्षेत्र नया है। ऐसे में इन दोनों नेताओं के बिना चुनाव जीतना भाजपा के चुनौती बनी है।