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उत्तराखंड@ 25: सर्विस सेक्टर साकार करेगा दोगुनी जीडीपी का सपना- संजीव चोपड़ा

Mon, 01 Aug 2022 02:31 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 01 Aug 2022 02:31 PM IST
सार

Special article by@Sanjeev Chopra: उत्तराखंड राज्य गठन के शुरुआती दौर में एक मोड़ ऐसा था जब उसकी विकास दर अपने जनक राज्य उत्तरप्रदेश से भी अधिक थी। उसी दौर में उत्तरप्रदेश के सांसदों के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने उत्तराखंड के रियायती औद्योगिक पैकेज को वापस लिए जाने की मांग भी की।

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Lbs Academy Former sanjeev chopra Article for gdp of Uttarakhand
लेखक संजीव चोपड़ा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

इस आलेख शृंखला की पहली किस्त में हमने ऐसी रणनीति की बात की थी जो सुनिश्चित करे कि राज्य गठन के 25वें वर्ष में उत्तराखंड का एक भी नागरिक गरीबी रेखा से नीचे न हो। बेशक यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य है लेकिन ये व्यावहारिक भी है। खासतौर पर इसलिए कि हाल में मुख्यमंत्री धामी ने घोषणा की है कि अगले पांच साल में उत्तराखंड के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को मौजूदा दो लाख 76 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच लाख 52 हजार करोड़ रुपये किया जाएगा।

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उम्मीद है कि मुख्यमंत्री की यह घोषणा केवल घोषणा साबित नहीं होगी। उसके क्रियान्वयन के लिए बाकायदा एक रोडमैप बनेगा, आवश्यक नीतिगत परिवर्तन होंगे. निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और रोजगार सृजन के लिए संसाधनों का परिचालन होगा। यहां यह भी रेखांकित होना चाहिए कि पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश ने तो अपनी जीडीपी के लिए और भी महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। वे इन्हीं पांच वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को ट्रिलियन डालर यानी एक लाख करोड़ डॉलर के बराबर करना चाहते हैं। डॉलर को रुपये में बदलकर देखें तो यह लगभग 80 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठेगा।
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उत्तराखंड राज्य गठन के शुरुआती दौर में एक मोड़ ऐसा था जब उसकी विकास दर अपने जनक राज्य उत्तरप्रदेश से भी अधिक थी। उसी दौर में उत्तरप्रदेश के सांसदों के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने उत्तराखंड के रियायती औद्योगिक पैकेज को वापस लिए जाने की मांग भी की। वास्तव में उत्तराखंड में उस वक्त इंडस्ट्री की जो नींव पड़ी थी उसकी बदौलत राज्य में निर्माण और सेवा क्षेत्र का एक अच्छा ढांचा विकसित हो गया। लेकिन पिछले वित्त वर्ष में यूपी बनाम उत्तराखंड के समीकरण बदलते दिखे हैं। पिछले साल यूपी की विकास दर 17 फीसदी के आसपास रही जबकि उत्तराखंड की मात्र नौ फीसदी। इसका एक ही अर्थ है। अगर राज्य में काम करने का ढर्रा नहीं बदला तो दोगुनी विकास दर के उस लक्ष्य को पाना मुश्किल होगा, जिसे इतने आत्मविश्वास के साथ मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के समक्ष परोसा है।

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यूपी बनाम उत्तराखंड

आइए एक नजर दोनों राज्यों के आर्थिक ढांचे पर डालें। उत्तराखंड में जीडीपी में केवल 13 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है जबकि यूपी में 26 प्रतिशत । उत्तराखंड की जीडीपी में 42 प्रतिशत और 44 प्रतिशत हिस्से क्रमशः इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर से आते हैं। यूपी में इंडस्ट्री का हिस्सा 25 फीसदी और सर्विस सेक्टर का 49 फीसदी है। वहीं यूपी में आज भी 20 फीसदी आबादी गरीब है जबकि उत्तराखंड में सिर्फ 10 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है।

बहरहाल यूपी ने पहले ही एक खरब डॉलर के अपने लक्ष्य के लिए तैयारी शुरू कर दी है। उसने देश के शीर्ष उद्योगपतियों को मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद में आमंत्रित किया है। बेशक कुछ चीजें पहले से यूपी के हक में जाती हैं। मसलन नोएडा और ग्रेटर नोएडा एनसीआर के हिस्से हैं और कानपुर उनका लंबे समय से औद्योगिक केंद्र रहा है। मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद अगले पांच साल में निवेश लक्ष्यों को पूरा कर पाती है या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक बात साफ है। उन्हें यह अहसास लगातार होता रहेगा कि औद्योगिक क्षेत्रों का मूड कैसा है। याद रहे ईज आफ डूइंग बिजनेस यानी कारोबारी सुगमता का एक अदृश्य मगर अनिवार्य पहलू होता है - फीडगुड फैक्टर। यूपी सरकार के प्रवक्ता बार बार निवेशकों के सामने सीएम के कार्यकाल की लंबाई और सरकार की स्थिरता को रेखांकित करते हैं। उत्तराखंड जहां बार बार हटाए जा रहे मुख्यमंत्रियों का साक्षी रहा वहां यूपी स्थिर सरकार वाले एक निर्णायक सीएम का गवाह रहा।

उत्तराखंड में आज का परिदृश्य अलग है। एक मजबूत सरकार वजूद में है। मगर आज हमें यह हकीकत भी कबूल करनी होगी कि रियायती औद्योगिक पैकेज विदा हो चुका है और जीएसटी के समीकरण भी उतने सुहाने नहीं रहे। अब तो उत्तराखंड को सर्विस सेक्टर की तरफ देखना होगा। चारधाम यात्रा के लिए जो आर्थिक ढांचा राज्य में तैयार हो रहा है उसका फायदा अब हमें इको टूरिज्म, वेलनेस सेंटर, रोमांचक खेलों, आर्गेनिक फार्मिग और पहाड़ी इलाकों में शैक्षिक संस्थान विकसित करने में उठाना चाहिए।

इंडस्ट्री-कॉलेज गठजोड़ : पुणे मॉडल

पिछले सप्ताह मैं पुणे के दौरे पर था। वहां तो एमआईटी और सिम्बॉसिस संस्थानों ने शहर का नक्शा ही बदलकर रख दिया है। फिर वहां पुराने प्रतिष्ठित विद्यार्जन केंद्र भी हैं ही फर्गुसन कॉलेज, ज्योतिबा फुले पुणे यूनिवर्सिटी, गोखले इंस्टीट्यूट, भंडारकर इंस्टीट्यूट और फिल्म व टीवी संस्थान। इन सभी संस्थानों में एक अनौपचारिक गठजोड़ है। एजुकेशनल डिग्रियों और । पाठ्यक्रमों को इंडस्ट्री की नौकरियों में तब्दील करने के लिए वे बड़ी उम्दा नेटवर्किंग का प्रयोग करते हैं। उत्तराखंड में यह काम कुछ हद तक सीआईआई ने किया है लेकिन अब वक्त आ गया है कि सीएम ऑफिस इस तरफ ध्यान दे ताकि उच्च शिक्षा विभाग, पर्यटन और उद्योग विभाग बढ़िया जुगलबंदी का नजारा पेश करें।

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फिल्म इंडस्ट्री और उत्तराखंड

इस बिंदु पर यह विमर्श हमें सिनेमा, संगीत, विज्ञापन फिल्मों और क्रिएटिव्स के संसार की तरफ ले आता है। मुख्यमंत्री ने सिनेमा संगीत उद्योग के लिए प्रोत्साहनों का वादा किया है। लेकिन इतना ही जरूरी है कि हम अपने राज्य को फिल्म फेस्टिवल, फिल्म एक्सपो व अवार्ड के राष्ट्रीय मानचित्र पर ले आएं। अगर हम गोवा, दिल्ली या कोलकाता की तरह सिनेमा स्मृति समारोहों का आयोजन करें, तो देश-विदेश के प्रतिष्ठित निदेशकों, भिनेताओं, निर्माताओं, समीक्षकों और , विशेषज्ञों की प्रदेश में लाइन लग जाएगी। पांच साल बाद, उससे अगले चरण में, इस्राइल, जापान, ईरान, तुर्की, अमेरिकी, जर्मन या फ्रेंच सिनेमा पर फोकस करने वाले फेस्टिवल आयोजित करने से हमें कौन रोकेगा? फिल्म संस्कृति के इस उत्सव के समांतर अगर हम इन कलाओं का प्रशिक्षण देने वाले संस्थान विकसित करें तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। एक फिल्म सिटी और ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट होने से यहां शूटिंग करने की और सेट लगाने की लागत कम हो सकती है। उपकरण किराए पर लेने की सुविधा मिलने लगेगी। साथ ही अच्छी फिल्में बनाने के लिए सुप्रशिक्षित छायाकार, नृत्य निदेशक, वीडियोग्राफर, कैमरामैन, एक्शन व मेकअप कलाकार, पटकथा लेखक, संगीतकार भी स्थानीय तौर पर उपलब्ध होंगे। आखिर यह वही उत्तराखंड है जहां से तिग्मांशु धूलिया, हिमानी शिवपुरी, टॉम ऑल्टर, अर्चना पूरणसिंह, सतीश शर्मा जैसे कलाकार निकले हैं। इन सब का देवभूमि कनेक्शन राज्य की इस मुहिम में मददगार साबित होगा। एक और बात, राज्य का मूवी इन्फ्रास्ट्रक्चर आगे चलकर देश-विदेश के पर्यटकों की निगाह में चार धाम यात्रा और पर्यटन की सभी परियोजनाओं के आर्कषण को कई गुना बढ़ा देगा।

Special article by@Sanjeev Chopra

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