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बदरीनाथ मार्ग पर अब ये 'आपदा' कर रही है इंतजार

Thu, 27 Feb 2014 11:10 AM IST
अंकित गर्ग/ अमर उजाला, रुड़की
अंकित गर्ग/ अमर उजाला, रुड़की Updated Thu, 27 Feb 2014 11:10 AM IST
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landslide in badrinath highway

बदरीनाथ जाना हो तो जरा संभलकर जाएं! इस मार्ग पर चुनौतियां आपके सामने मुश्किलों के पहाड़ खड़े कर सकती हैं।

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इस मार्ग पर बदरीनाथ से 18 किलोमीटर पहले लांबागढ़, पागल नाला के नाम से जाना जाने वाला टंगनी लैंडस्लाइड जोन एवं पाताल गंगा भूस्खलन के लिहाज से अत्यधिक जोखिम भरे हैं।
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वहीं पीपलकोटी, हेलंग और पांडुकेश्वर के पास अपेक्षाकृत कम जोखिम है। सीबीआरआई (केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान) रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. एस सरकार एवं डॉ. डीपी कानूनगो ने अलकनंदा घाटी के ऊपरी हिस्से में भूस्खलन क्षेत्रों का निर्धारण तथा नियंत्रण उपायों के लिए निर्देशिका तैयार की है।

हाई रेज्याल्यूशन सेटेलाइट फोटो डाटा का उपयोग

landslide in badrinath highway

भूस्खलन के चिह्नीकरण में हाई रेज्याल्यूशन सेटेलाइट फोटो डाटा का उपयोग किया गया है।

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रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तराखंड के अलकनंदा घाटी के ऊपरी क्षेत्रों में चमोली-बदरीनाथ मार्ग (एनएच-58) पर चट्टान स्खलन पीपलकोटी से जोशीमठ की ओर 10 से 11 किलोमीटर के बीच स्थित है।

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इस जगह पर भूस्खलन जान और माल के नुकसान का कारण बन रहे हैं। चमोली से बदरीनाथ के मार्ग का हिस्सा भौगोलिक संरचना, तीव्र ढलान, अतिवृष्टि तथा भूकंप सक्रिय क्षेत्र होने की वजह से भूस्खलन के लिए अति संवेदनशील है।

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सीबीआरआई ने अपनी निर्देशिका जारी करने से पूर्व लैब में इसकी पुष्टि की है।

रॉक फॉल संभावित क्षेत्रों में ज्यादा खतरा

landslide in badrinath highway

रॉक फाल संभावित क्षेत्रों में भूस्खलन को ज्यादा विनाशकारी बताया गया है। ऐसे स्थानों पर पत्थरों के गिरने की तीव्रता 5 मीटर प्रति सेकेंड आंकी गई है।

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प्रभावित क्षेत्रों में पहाड़ों के ढलान की ऊपरी सतह मिट्टी से निर्मित है। मिट्टी का भार दो अलग-अलग पर्तों में लगभग 3.6 मीटर मोटा है।

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ऊपरी परत महीन और लगभग 0.9 मीटर मोटी है। मिट्टी के नीचे ढलान वाली डोलामाइट चट्टानें है। ये चट्टानें भी बेहद कमजोर हैं। जो मलबा बहुधा गिरता है और बार-बार मार्ग बाधित करता है उसका परिमाप 50 घन मीटर से एक लाख घन मीटर के बीच है।

इन उपायों से पहाड़ों को मिलेगी मजबूती

landslide in badrinath highway

वैज्ञानिकों ने भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में पहाडों को मजबूती प्रदान करने के लिए उपाय सुझाए हैं।

जिनमें जियोग्रिड्स, सॉयल नेलिंग, शॉट क्रीटिंग, चेक डैम, एकरिंग, रॉक कैच फेंसिंग तथा तारों का जाल बनाने, बायो इंजीनियरिंग उपायों के उपयोग से रिटेनिंग वाल शामलि है।

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इनमें सॉयल नेलिंग तकनीक से मलबे के भीतर पक्के पहाड़ तक ड्रिल कर रॉड से जोड़ा जाता है। साथ ही बायो इंजीनियरिंग से बाहरी हिस्से पर रिटेनिंग वाल बनाकर मजबूती दी जाती है, जबकि शॉ क्रीटिंग के जरिए भुरभुरा कर गिरने वाले पहाड़ के हिस्से को सीमेंट और अन्य मैटीरियल के पेस्ट से रोका जाता है।

अध्ययन का मकसद

landslide in badrinath highway

चेक डैम के जरिए ऊपर से गिरने वाले पत्थरों को बीच में रोक दिया जाता है। इसके अलावा एकरिंग, रॉक कै च फैसिंग तथा तारों के जाल भी पहाड़ों को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

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सीबीआरआई स्वतंत्र अध्ययन संस्थान है। यह सीएसआईआर (केंद्रीय वैज्ञानिक एवम औद्योगिक संस्थान) को अपनी रिपोर्ट भेजता है। सीएसआईआर का उद्देश्य ऐसा वैज्ञानिक और औद्योगिक अध्ययन और विकास उपलब्ध कराना है।

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जिससे भारत के लोगों को अत्यधिक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ हो। सीएसआईआर की रिपोर्ट सभी केंद्रीय निर्माण एजेंसियां लाभ उठाती हैं।

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