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आपदा के दो साल: हालात से जीती केदारघाटी

Tue, 16 Jun 2015 09:49 AM IST
विनय बहुगुणा/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
विनय बहुगुणा/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग Updated Tue, 16 Jun 2015 09:49 AM IST
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kedar valley condition two years after disaster.

आपदा से बेहाल और बदहाल हुई केदारघाटी अपने बलबूते पर खड़ी हुई है। यहां जीवन पटरी पर लौटा है। लोगों ने अपनी लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं के अनुसार तीज त्योहार और मेलों का आयोजन ही नहीं किया बल्कि उजड़ी खेती को संवारने का काम भी शुरू किया है।

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वर्ष 2012 की ऊखीमठ आपदा और 16/17 जून 2013 की आपदा में मिले दुख-दर्द को सीने में लिए केदारघाटी के गांवों ने विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए स्वयं को खड़ा किया। यहां के लोगों ने जहां अपने पशुपालन, खेतीबाड़ी से आजीविका को पुन: शुरू किया, वहीं दो वर्ष तक ठप धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को भी फिर से शुरू कर जमीन से जुड़े होने का संदेश दिया।
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जखोली और अगस्त्यमुनि में बीते वर्ष अप्रैल माह में जहां वैसाखी मेलों की पुन: शुरूआत हुई, वहीं नवंबर माह में ऊखीमठ में तीन दिवसीय मद्महेश्वर मेले में केदारघाटी संपूर्ण रूप से एक नजर आई। वर्ष 2014 में क्षेत्र की खुशहाली और सुख-समृद्धि के लिए केदारघाटी सहित जनपद के कई गांवों में पांडव नृत्य का आयोजन भी किया गया, जिसमें लोगों ने बढ़-चढ़कर कर भाग लिया।

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54 लोगों को खोने वाला देवलीभणिग्राम बना आदर्श गांव

kedar valley condition two years after disaster.

वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा से सबसे अधिक जनहानि वाले देवलीभणिग्राम को गढ़वाल सांसद बीसी खंडूरी ने सांसद आदर्श गांव के तहत गोद लिया। आपदा में इस गांव के 54 लोगों की मौत हो गई थी।

यहां की 30 से अधिक महिलाएं विधवा हो गई थी। कई घरों में यहां सिर्फ महिलाएं रह गई हैं। सांसद खंडूरी का कहना है कि गांव की विधवा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी आर्थिकी के लिए ठोस प्रयास करने के उद्देश्य से ही यह गांव गोद लिया गया है।

सांसद बनने के बाद से खंडूरी तीन बार गांव का दौरा कर चुके हैं। इस गांव के विकास के लिए तीस करोड़ से अधिक लागत की 25 से अधिक योजनाओं के प्रस्ताव बने हैं।

हस्तशिल्प से आत्मनिर्भर बन रही महिलाएं

kedar valley condition two years after disaster.

आपदा प्रभावित देवलीभणिग्राम और लमगौंडी की 67 प्रभावित महिलाएं मंदाकिनी बुनकर समिति के हथकरघा आधारित उत्पादन केंद्र में पिछले वर्ष से हस्तशिल्प का प्रशिक्षण ले रही हैं। इनमें कई ऐसी भी हैं, जिन्होंने आपदा में अपने पति, ससुर, भाई, ताऊ, जीजा और पिता तक को खोया है।

ये महिलाएं प्रात: 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक ऊन के धागों को सुलझाते हुए जहां अपने दुखों को भूलने का प्रयास करती हैं। वहीं भविष्य के लिए आत्मनिर्भर बनने के गुर भी सीख रही हैं। यहीं नहीं वे ऊन की फनाई सहित कढ़ाई, पेटिंग व अन्य कार्य भी सीख रही हैं। बुनकर समिति इन्हें प्रतिमाह 18 सौ रुपये मानदेय दे रही है।

समिति के निदेशक डॉ. एचके बगवाड़ी बताते हैं कि उनका प्रयास महिलाओं को दुख के भंवर से बाहर निकालकर भविष्य के लिए आत्मनिर्भर बनाना है।

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