CourageInKargil: दुश्मनों को ढेर करने के बाद शहीद हुए थे ये रणबांकुरे, पढ़ें इनकी दिलेरी और साहस के किस्से
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सदियों से हिमालय विदेशी हमलावरों से देश की रक्षा करता रहा है। अब यह जिम्मेदारी ‘हिमालय पुत्रों’ ने सफलतापूर्वक अपने कंधे पर ले ली है। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य को इस बात का फख्र है कि हर सौवां भारतीय सैनिक उत्तराखंडी है। इस राज्य ने सेनाध्यक्ष समेत अनगिनत रणबांकुरों को देश सेवा में भेजा है।
वर्तमान में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत समेत उत्तराखंड के लाखों जवान देश सेवा में लगे हुए हैं। दून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी भी शीर्षस्थ सैन्य अगुवा दे चुकी है। प्रथम महावीर चक्र विजेता, कई विक्टोरिया चक्र, कई अशोक चक्र और अनेक सेना मेडल उत्तराखंडियों की जांबाजी के गवाह हैं। यहां के सैकड़ों घरों में पीढ़ियों से सैन्यसेवा की परंपरा चली आ रही है, जो वक्त से साथ और प्रगाढ़ होती जा रही है। हर युद्ध की तरह कारगिल के युद्ध में भी यहां के जवानों ने गजब का शौर्य दिखाया था...
पांच दुश्मनों को मारकर शहीद हुए थे खीम सिंह कुंवर
कारगिल युद्ध में बनबसा क्षेत्र के ग्राम पचपकरिया के खीम सिंह कुंवर ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। 9 पैरा में नायक के पद पर तैनात खीम ने कुपवाड़ा सेक्टर में शहीद होने से पहले पांच दुश्मनों को मार गिराया था। शहादत के वक्त गर्भवती रहीं पत्नी मंजू ने कुछ महीनों के बाद बेटे को जन्म दिया था जो अब 20 वर्ष का जवान है। शहीद की पत्नी मंजू बरेली में रेल विभाग में कार्यरत है। शहीद की स्मृति को संजोने के लिए 2000 में बनबसा बस स्टेशन के पास शहीद स्मारक बना है। शहीद बेटे की याद आते ही मां लक्ष्मी देवी भावुक हो जाती हैं और कहती हैं कि वीर नारियों के साथ शहीद के माता-पिता की भी सरकार को सुध लेनी चाहिए।
घुसपैठियों को मारने के बाद गिरीश सिंह सामंत हुए थे शहीद
देवलथल क्षेत्र उड़ई गांव निवासी हवलदार गिरीश सिंह सामंत कारगिल युद्ध के दौरान घुसपैठियों को मार गिराने के दौरान शहीद हो गए थे। सीने पर उनके नौ गोलियां लगी थीं। पति की शहादत के समय बेटी मोनिका और बेटा अमित बहुत छोटे थे। तमाम कठिन हालातों के बावजूद शांति ने न केवल खुद को संभाला बल्कि दो मासूम बच्चों की भी परवरिश की। शहीद के परिजनों का कहना है कि गिरीश सिंह के नाम से बनी सड़क में डामरीकरण नहीं हुआ है। गांव में एक प्रवेश द्वार बनाने की घोषणा हुई थी जो अभी पूरी नहीं हुई है।
शहीद जौहार सिंह: सेना में अधिकारी बन देश सेवा करना चाहती है शहीद की बेटी
कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देकर देश के लिए शहीद होने वाले मड़मानले के सपूत जौहार सिंह की बेटी रेनू धामी पापा की तरह सेना में भर्ती होकर देश सेवा करना चाहती है। जब जौहार सिंह शहीद हुए थे। उस समय रेनू मात्र छह माह की थी। शहीद की पत्नी लीला देवी ने मुश्किलों का सामना करते हुए अपने परिवार को संभाला। लीला देवी का कहना है कि सरकार और शासन-प्रशासन को शहीदों याद सिर्फ कारगिल दिवस को ही आती है। अन्य समय कोई शहीद के परिजनों का हाल जानने भी नहीं आता।
मड़मानले निवासी शहीद जौहार सिंह 1994 में भारतीय सेना का हिस्सा बने थे। 19 जेड राइफल्स में तैनात जौहार सिंह दुश्मनों से लोहा लेते हुए 26 मई 1999 को शहीद हो गए। रेनू अभी पिथौरागढ़ महाविद्यालय में बीकॉम द्वितीय वर्ष की छात्रा है। शहीद का परिवार सरकार की ओर से किए वादे पूरे नहीं होने से नाराज है। शहीद की पत्नी लीला देवी का कहना है कि जौहार सिंह की शहादत पर सरकार ने बड़े-बड़े वादे किए थे। लेकिन सरकार अब तक उनसे किए वादों को पूरा नहीं कर पाई है। शहीद की पत्नी लीला देवी मड़मानले तिराहे में शहीद स्मारक और मड़मानले-पुगौर सड़क का नाम शहीद के नाम से करने की मांग कर रही हैं। कारगिल शहीद की वीरांगना लीला देवी ने बताया कि उन्होंने कहा अन्य शहीदों को गैस एजेंसी, पेट्रोल पंप दिए गए लेकिन उनको कुछ भी नहीं दिया गया। बेटी के लिए सरकारी नौकरी मांगी वह भी पूरी नहीं हुई।
शहीद लांसनायक रामप्रसाद ध्यानी: वीर नारी ने फौज में भेजा सपूत
कारगिल युद्ध में भारत माता की रक्षा करते हुए प्राणों को न्यौछावर करने वाले शहीद लांसनायक रामप्रसाद ध्यानी का एक बेटा फौज में है। शुरू से वीरांगना की भी यही इच्छा थीं कि उनका एक बेटा फौज में जरूर जाए और वो मुराद पूरी भी हो गई। शहीद का बेटा वर्तमान में लैंसडाउन में ट्रेनिंग ले रहा है।
पीरूमदारा क्षेत्र के हाथीडंगर निवासी 17वीं गढ़वाल राइफल्स के लांसनायक रामप्रसाद ध्यानी 25 जुलाई 1999 को कारगिल में शहीद हो गए थे। वह मूल रूप से गांव डांडातौली, पोस्ट तोल्यूडांडा तहसील धुमाकोट जिला पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले थे। रामप्रसाद ध्यानी के पिता सकलानंद, माता सिंदोरी देवी छोटे बेटे सुबोध के साथ रहते हैं। रामप्रसाद ध्यानी की पत्नी जयंती देवी को पीरूमदारा में पेट्रोल पंप मिला है। उनकेे दो पुत्र अंकित ध्यानी, अजय ध्यानी और एक पुत्री ज्योति ध्यानी हैं, जिसकी शादी हो चुकी है। वीरांगना जयंती देवी बताती हैं कि पति की शहादत के बाद बेटे को भी फौज में भेजने की इच्चा थी जो पूरी हो गई है। उनका बेटा अजय ध्यानी इस वर्ष सेना में भर्ती हुआ है और वर्तमान में लैंसडाउन में ट्रेनिंग कर रहा है।
ये बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे अंकित ध्यानी ने बताया कि उनके गांव हाथी डंगर सड़क का नाम उनके पिता के नाम पर रखने की प्रशासन की ओर से घोषणा की गई थी। बीस साल बीत गए, लेकिन अभी घोषणा पूरी नहीं हुई। इससे उनका परिवार आहत है। लखनपुर में शहीद स्मारक बनाया गया है, जहां पर शहीद विश्वबंधु रावत के अलावा उनके पिता रामप्रसाद ध्यानी की प्रतिमा लगी है। पिता की प्रतिमा का रंग उड़ रहा है और सीमेंट दिखाई देने लगा रहा है। प्रशासन की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है और प्रतिमा की उपेक्षा की जा रही है।
कारगिल शहीद चंदन के बलिदान को भुला दिया गया
कारगिल युद्ध के दौरान देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले नायक चंदन सिंह भंडारी की वीरता को कोई भुला नहीं सकता है लेकिन गांव में उनके नाम पर एक सड़क या स्कूल तक नहीं है। प्रदेश सरकार ने शहीद के बच्चों को नौकरी का वादा किया था लेकिन सत्ता में आने वाले लोग अपना वादा भूल गए। शहीद की पत्नी अभावों में जीकर बच्चों को पालकर बड़ा किया। सेमलखा गरमपानी के मूल निवासी चंदन सिंह भंडारी की पत्नी अनीता भंडारी ने बताया कि 20 अगस्त 1999 को पति की शहादत की जानकारी उन्हें रानीखेत में मिली।
उस समय उनकी बड़ी बेटी संध्या भंडारी आठ साल, बेटा नितेश भंडारी छह साल और छोेटा बेटा निखिल भंडारी दो साल का था। बच्चों की परवरिश करने के लिए उन्हें काफी मुश्किलें उठानी पड़ीं। हालांकि तत्कालीन अटल बिहारी बाजपेई सरकार ने उस समय काफी आर्थिक मदद की। अनीता के अनुसार युद्ध के बाद प्रदेश सरकार ने परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था लेकिन किसी बच्चे को नौकरी नहीं दी। शहीद के छोटे बेटे निखिल भंडारी ने बताया कि उसके पिता ने कारगिल युद्ध की ऊंची चोटी पर शहादत दी। उसे परिवार का कोई सदस्य इसे भुला नहीं सकता है।
चंदन में था वीरता का जज्बा
जिला पूर्व सैनिक लीग के अध्यक्ष मेजर बीएस रौतेला ने बताया कि कारगिल युद्ध के समय नायक चंदन सिंह भंडारी की पलटन दूसरे जगह पर तैनात थी। इस बीच सेना के कमांडर ने सवाल किया था कि जो भी सैनिक युद्ध में जाना चाहता है वह अपना नाम दर्ज करा सकता है। नायक चंदन सिंह ने कारगिल के लिए पहले अपना नाम दर्ज कराया था। चंदन लड़ते लड़ते काफी ऊंची चोटी टाइगर हिल तक चढ़ गए। इस बीच दुश्मन का गोला उनके सिर पर गिर पड़ा और कुमाऊं का लाल वीरगति को प्राप्त हो गया।
शहीद कुंडल के गांव में न प्रतिमा लगी न पार्क बना
22 जुलाई 1978 को राम सिंह बेलाल के घर में जन्मे कुंडल को देशभक्ति विरासत में मिली। दादा आजाद हिंद फौज के सिपाही होने के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे। कमांडो ट्रेनिंग के बाद कुंडल को सिपाही से नायक बना दिया। शहीद होने से कुछ समय पहले कुंडल घर आए थे। परिजनों ने शादी की बात शुरू की तो उन्होंने पहले मकान बनाने की बात करते हुए शादी से मना कर दिया। उनके पिता कहते हैं सरकार ने कुंडल के नाम से गांव में पार्क बनाकर प्रतिमा लगाते हुए स्मृति पटल लगाने की बात कही थी, लेकिन आज तक न पार्क बना न प्रतिमा लगी।
कुंडल की मां बेटे की गौरव गाथा बताते हुए कहती है कि कुंडल आपरेशन विजय के दौरान दुश्मनों से लोहा लेते हुए बर्फीली खाई में गिरकर शहीद हो गए थे। कुंडल के घर बिलाई में 60 वर्षीय मां कुना देवी, 65 वर्षीय पिता राम सिंह, छोटा भाई प्रकाश बेलाल और उसका परिवार रहता है। कुंडल के नाम से पत्थरखानी इंटर कालेज का नाम रखा गया है। उनके नाम से सरकार ने अशोक नगर-बिलाई-भाटीगांव के लिए सड़क भी काटी। 20 साल बाद अब सड़क पर डामर हुआ है। उनके नाम से भाई प्रकाश हर साल गांव में क्रिकेट प्रतियोगिता कराते हैं।
पैर में गोली लगने के बाद भी दुश्मनों से लोहा लेते रहे थे महेश
हल्द्वानी के ऊंचापुल में रहने वाले महेश चंद्र पाठक ने 1998 में सेना ज्वाइन की। महेश को मार्च 1998 में बतौर सिपाही 1 नागा रेजिमेंट में पहली पोस्टिंग कश्मीर में मिली। इसी दौरान कारगिल की जंग शुरू होने के कारण 1 नागा रेजिमेंट को भी इसमें शामिल किया गया। 26 मई को महेश चंद्र को 5140 पोस्ट को खाली कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। पोस्ट खाली कराने के लिए जब महेश और उनके साथी बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ने लगे तो चोटी पर जमी दुश्मनों की फौज ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी।
दोपहर के समय एक गोली महेश के बाएं पैर में लगी जिससे वह घायल हो गए। 27 मई को हैलिकॉप्टर से उन्हें श्रीनगर के अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया गया। जख्म गहरा होने से पैर काटना पड़ा और करीब आठ महीने तक अस्पताल में उपचार कराने के बाद उन्हें मेडिकल रिटार्यरमेंट देकर घर भेज दिया गया। उन्हें जंग में पैर गंवाने का अफसोस नहीं है लेकिन इसके कारण सेना में मात्र 16 माह ही सेवा दे पाए इसका मलाल है।