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Dehradun News: देव के तराजू पर एक रुपये की नाजिल से निष्पक्ष न्याय
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Iमुगलकाल से चली आ रही स्याणाचारी व्यवस्था
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Iमामूली विवाद से लेकर आपराधिक मामलों का भी होता है निपटाराI
जौनसार बावर अपनी अनूठी संस्कृति के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां मुगलकालीन स्याणाचारी व्यवस्था भी हमेशा से चर्चाओं में रहती है। यह ऐसी स्थानीय न्यायिक व्यवस्था है, जिसमें बड़े से बड़े विवाद और आपराधिक मामलों का निपटारा किया जाता है। इसमें शिकायतकर्ता को केवल एक रुपये देकर नालिस दर्ज करवानी पड़ती है। पंचो के एकमत होने के बाद स्याणा निर्णय सुनाते हैं, जो दोनों पक्षों के लिए मान्य होता है। जौनसार क्षेत्र के लोग स्याणाचारी व्यवस्था को सबसे सस्ता और सुलभ न्याय मानते हैं।
जौनसार क्षेत्र में देव की सत्ता और देव के न्याय पर जनजातीय क्षेत्र के लोगों का अटूट विश्वास है। यह ग्राम, खाग और खत (सदर ) स्तर पर स्याणा होते हैं। स्याणा को महासू देवता का प्रतिनिधि माना जाता है। वर्ष 1851 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की ओर से तैयार संशोधित दस्तूर-उल-अमल में स्याणा के अधिकारों का उल्लेख किया गया है। हालांकि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 और उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 के लागू होने के बाद स्याणा के पद समाप्त हो गए, लेकिन स्याणाचारी व्यवस्था पूर्व की तरह आज भी जारी है।
खत कोरू के सदर स्याणा सुनील जोशी बताते हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने स्याणाचारी व्यवस्था को मान्यता दी थी। इसका प्रमाण आज भी मौजूद है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र के लोग स्याणा के सुनाए निर्णय को मानते हैं। बताया कि मामूली से लेकर बड़े से बड़े विवाद को भी पंचों के माध्यम से सुलझाया जाता है।
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दसोऊ के सदर स्याणा शूरवीर सिंह सजवाण ने बताया कि ब्रिटिश काल में स्याणा राजस्व भी एकत्र करते थे। स्याणाचारी व्यवस्था में नियम कानून बहुत सख्त है। उन्होंने कहा कि एक रुपये में न्याय कहा मिलता है। न्याय देते समय दोनों पक्षों की हैसियत भी देखी जाती है। अगर अपराधी निम्न वर्ग है तो उस पर हैसियत के अनुसार जुर्माने या अन्य दंड लगाया जाता है। बताया कि स्याणा के सुनाए निर्णय को सभी मानते हैं। निर्णय न मानने में सामाजिक बहिष्कार जैसे सख्त नियम हैं। हालांकि, व्यक्ति के पास अन्य कानूनी विकल्प के प्रयोग का पूरा अधिकार रहता है। उन्होंने कहा कि स्याणाचारी व्यवस्था में मामूली चोरी, संपत्ति, अपहरण ही नहीं हत्या जैसे विवाद सुलझाने की बात सुनी जाती है।
Iयह है व्यवस्थाI
महासू देवता के मुख्य प्रतिनिधि बजीर होता है। मुख्य बजीर हनोल स्थित महासू मंदिर में रहते हैं। बजीर के बाद चार चौंतरू होते हैं। उसके बाद 39 सदर (खत) स्याणा, तीन चार गावों पर एक खाग स्याणा और 415 राजस्व ग्राम स्याणा हैं।
Iकैसे काम करती है व्यवस्थाI
सदर स्याणा शूरवीर सिंह चौहान और सुनील जोशी ने बताया कि शिकायतकर्ता ग्राम स्याणा के पास अपना मामला लेकर आता है। वह शिकायत दर्ज करवाने के लिए एक रुपये की नालिस देता है। उसके बाद ग्राम स्याणा दिन तय कर ग्राम, खाग, खत स्याणा और ग्रामीणों को बुलावा भेजता है। मामले में पंच बनाकर दोनों पक्षों का विवाद सुना जाता है। पंचों का फैसला स्याणा सुनाता है।
Iस्याणा का बेटा ही बना है स्याणाI
स्याणा का बेटा ही स्याणा बनता है। दस्तूर-उल-अमल में दर्ज धाराओं के तहत स्याणा के बाद उनका बड़ा बेटा ही स्याणा बनता है। छोटा बेटा भाई के जीवित रहते हुए पद पर दावा पेश नहीं कर सकता है। अगर बड़े भाई की मृत्यु हो गई है तो फिर छोटे भाई को स्याणा बनाया जाता है। बेटे की आयु 18 वर्ष से कम होने पर स्याणा का भाई नायब स्याणा बनता है। पक्षपात करने पर स्याणाा को बर्खास्त किया जा सकता है। वहीं, संपंतियों और कुछ अधिकारों के लिए स्याणा को भी 11 खत स्याणाओं के पैनल की मंजूरी लेनी पड़ती है।
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Iमामूली विवाद से लेकर आपराधिक मामलों का भी होता है निपटाराI
जौनसार बावर अपनी अनूठी संस्कृति के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां मुगलकालीन स्याणाचारी व्यवस्था भी हमेशा से चर्चाओं में रहती है। यह ऐसी स्थानीय न्यायिक व्यवस्था है, जिसमें बड़े से बड़े विवाद और आपराधिक मामलों का निपटारा किया जाता है। इसमें शिकायतकर्ता को केवल एक रुपये देकर नालिस दर्ज करवानी पड़ती है। पंचो के एकमत होने के बाद स्याणा निर्णय सुनाते हैं, जो दोनों पक्षों के लिए मान्य होता है। जौनसार क्षेत्र के लोग स्याणाचारी व्यवस्था को सबसे सस्ता और सुलभ न्याय मानते हैं।
जौनसार क्षेत्र में देव की सत्ता और देव के न्याय पर जनजातीय क्षेत्र के लोगों का अटूट विश्वास है। यह ग्राम, खाग और खत (सदर ) स्तर पर स्याणा होते हैं। स्याणा को महासू देवता का प्रतिनिधि माना जाता है। वर्ष 1851 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की ओर से तैयार संशोधित दस्तूर-उल-अमल में स्याणा के अधिकारों का उल्लेख किया गया है। हालांकि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 और उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 के लागू होने के बाद स्याणा के पद समाप्त हो गए, लेकिन स्याणाचारी व्यवस्था पूर्व की तरह आज भी जारी है।
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खत कोरू के सदर स्याणा सुनील जोशी बताते हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने स्याणाचारी व्यवस्था को मान्यता दी थी। इसका प्रमाण आज भी मौजूद है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र के लोग स्याणा के सुनाए निर्णय को मानते हैं। बताया कि मामूली से लेकर बड़े से बड़े विवाद को भी पंचों के माध्यम से सुलझाया जाता है।
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दसोऊ के सदर स्याणा शूरवीर सिंह सजवाण ने बताया कि ब्रिटिश काल में स्याणा राजस्व भी एकत्र करते थे। स्याणाचारी व्यवस्था में नियम कानून बहुत सख्त है। उन्होंने कहा कि एक रुपये में न्याय कहा मिलता है। न्याय देते समय दोनों पक्षों की हैसियत भी देखी जाती है। अगर अपराधी निम्न वर्ग है तो उस पर हैसियत के अनुसार जुर्माने या अन्य दंड लगाया जाता है। बताया कि स्याणा के सुनाए निर्णय को सभी मानते हैं। निर्णय न मानने में सामाजिक बहिष्कार जैसे सख्त नियम हैं। हालांकि, व्यक्ति के पास अन्य कानूनी विकल्प के प्रयोग का पूरा अधिकार रहता है। उन्होंने कहा कि स्याणाचारी व्यवस्था में मामूली चोरी, संपत्ति, अपहरण ही नहीं हत्या जैसे विवाद सुलझाने की बात सुनी जाती है।
Iयह है व्यवस्थाI
महासू देवता के मुख्य प्रतिनिधि बजीर होता है। मुख्य बजीर हनोल स्थित महासू मंदिर में रहते हैं। बजीर के बाद चार चौंतरू होते हैं। उसके बाद 39 सदर (खत) स्याणा, तीन चार गावों पर एक खाग स्याणा और 415 राजस्व ग्राम स्याणा हैं।
Iकैसे काम करती है व्यवस्थाI
सदर स्याणा शूरवीर सिंह चौहान और सुनील जोशी ने बताया कि शिकायतकर्ता ग्राम स्याणा के पास अपना मामला लेकर आता है। वह शिकायत दर्ज करवाने के लिए एक रुपये की नालिस देता है। उसके बाद ग्राम स्याणा दिन तय कर ग्राम, खाग, खत स्याणा और ग्रामीणों को बुलावा भेजता है। मामले में पंच बनाकर दोनों पक्षों का विवाद सुना जाता है। पंचों का फैसला स्याणा सुनाता है।
Iस्याणा का बेटा ही बना है स्याणाI
स्याणा का बेटा ही स्याणा बनता है। दस्तूर-उल-अमल में दर्ज धाराओं के तहत स्याणा के बाद उनका बड़ा बेटा ही स्याणा बनता है। छोटा बेटा भाई के जीवित रहते हुए पद पर दावा पेश नहीं कर सकता है। अगर बड़े भाई की मृत्यु हो गई है तो फिर छोटे भाई को स्याणा बनाया जाता है। बेटे की आयु 18 वर्ष से कम होने पर स्याणा का भाई नायब स्याणा बनता है। पक्षपात करने पर स्याणाा को बर्खास्त किया जा सकता है। वहीं, संपंतियों और कुछ अधिकारों के लिए स्याणा को भी 11 खत स्याणाओं के पैनल की मंजूरी लेनी पड़ती है।