{"_id":"d26c17b0343b060376f823dee6125a22","slug":"indian-forest-act-made-by-britishers","type":"story","status":"publish","title_hn":"हमारे जंगलों पर आज भी अंग्रेजों की 'हुकूमत'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हमारे जंगलों पर आज भी अंग्रेजों की 'हुकूमत'
प्रेम प्रताप सिंह
Updated Tue, 13 Aug 2013 10:29 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंग्रेज तो 66 साल पहले भारत छोड़ गए, लेकिन उनके बनाए कानून हम आज तक ढो रहे हैं। देश के जंगलों से अधिक से अधिक राजस्व वसूली के लिए अंग्रेजों का बनाया इंडिया फारेस्ट एक्ट 13 साल बाद सौ साल का हो जाएगा।
विज्ञापन
इतने पुराने कानून की वजह से स्थानीय लोगों को उनका अधिकार नहीं मिल रहा है। जंगलों का सफाया करने वालों पर भी सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती है। महज 500 रुपये जुर्माना अदा करके लोग फिर जंगलों का सफाया करने में जुट जाते हैं।
विज्ञापन
कानून में यह हैं खामियां
अंग्रेजी कानून ने स्थानीय लोगों के अधिकार को बांध रखा है। जंगल की रखवाली में स्थानीय लोगों को सहभागिता दी जाए तो वन संरक्षण की मुहिम बेहतर तरीके से कामयाब हो सकती है। जंगलों से निकलने वाले उत्पादों का कुछ हिस्सा देकर इस संबंध को और मजबूत किया जा सकता है। लेकिन इंडिया फारेस्ट एक्ट इसकी इजाजत नहीं देता।
विज्ञापन
दूसरी ओर, वन माफिया जंगल से पेड़ों का सफाया करें तो भी उन पर महज 500 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है। यह मामूली रकम चुकाकर माफिया फिर कटान में जुट जाते हैं।
वर्ष 1927 से अब तक जंगल लगातार कम हुए हैं। अंग्रेजों का बनाया कानून सक्षम होता तो आज पूरे देश में जंगलों के समाप्त होने का संकट नहीं होता। जिन्हें (ग्रामीणों को) जंगल बचाना था, उन्हें तो इस कानून ने पहले ही अलग कर दिया। यह वन नीति की बड़ी खामी है, जिसे नीति नियंताओं को बदलना चाहिए।
- अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद
अंग्रेजों ने इंडिया फारेस्ट एक्ट अपने मुनाफे के लिए बनाया था। अब पर्यावरण के लिए वनों का संरक्षण जरूरी है। ऐसे में इंडिया फारेस्ट एक्ट को फिर परिभाषित करने की जरूरत है, जिसमें कार्बन स्टॉक की बात शामिल हो। स्थानीय लोगों को जोड़कर इसके बदले कीमत दी जाए। जुर्माने की रकम बढ़ाने की भी जरूरत है।
- डा. आरबीएस रावत, प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड
फेसबुक पर अपनी राय देने के लिए यहां क्लिक करें