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खाली भूमि पर अपना 'कब्जा' चाहती है सेना
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 03 Oct 2013 12:35 PM IST
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राजधानी देहरादून की छावनियों में मौजूद कई सौ एकड़ खाली भूमि (बी 4 श्रेणी) को केवल सेना के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित किया जा रहा है।
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सेना ने यह भूमि केएलपी ( की लोकेशन प्लान) के तहत मांगी है। बी 4 श्रेणी का भू वर्गीकरण ए 1 में तब्दील करने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजा है। उधर, हजारों एकड़ खाली भूमि का इस्तेमाल सेना के लिए सुरक्षित किये जाने से वहां छावनी परिषदों व अन्य सरकारी विभागों को भविष्य में इस्तेमाल के लिए भूमि नहीं बचेगी।
भूभाग को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है सेना
ब्रिटिश समय से छावनियों में तीन प्रकार की भूमि की व्यवस्था है, जिसमें सर्वाधिक भूमि ए श्रेणी पूरी तरह से सेना के पास है। बी श्रेणी की चार उपश्रेणियां हैं, जिसमें बंगले, केंद्रीय कार्यालय और गैर सैन्य उपयोग की भूमि है। तीसरी श्रेणी सी है, जिसमें छावनी परिषद के भवन और वहां रहने वाली सिविल आबादी का भूभाग आता है। सेना लंबे अरसे से अपने भूभाग को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है।
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सेना चाहती है कि बी 4 का भू वर्गीकरण बदल कर केवल सैन्य इस्तेमाल के लिए सुरक्षित किया जाए। सेना ने रक्षा मंत्रालय को यह प्रस्ताव भेजा है। बताया जा रहा है कि इसपर सैद्धांतिक सहमति मिली है। कमान स्तर पर सितंबर माह में सैन्य अधिकारियों की रक्षा संपदा विभाग से हुई बैठक में इस प्रस्ताव के विस्तृत प्रारुप पर चर्चा भी हो चुकी है।
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बी 3 बंगलों पर भी सेना की नजर
सेना अपने परिसरों से लगते बंगलों (बी 3 श्रेणी भूमि) को अपने अधीन लेना चाहती है। 16 छावनियों में 92 बंगलों को अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को दे रखा है। बंगलों के कब्जे में लेने के 65 प्रस्तावों पर सेना को स्वीकृति भी मिल गई है, लेकिन प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन बंगलों का भू वर्गीकरण भी ए 1 श्रेणी में आएगा।
कहां जाएंगी अन्य परियोजनाएं
बी 4 श्रेणी की भूमि अगर सेना के पास जाती है तो कैंट बोर्ड सहित अन्य केंद्रीय कार्यालयों के लिए भूमि नहीं बचेगी। छावनियों में सीमित भूमि होने से बी 4 श्रेणी की भूमि बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे कैंट बोर्ड में भूमि की कमी से समस्याएं पैदा हो जाएंगी। रक्षा संपदा महानिदेशालय सेना के प्रस्ताव से पूरी तरह सहमति नहीं है। रक्षा संपदा विभाग चाहता है कि जहां सेना को जरूरत है वहां भूमि दी जाएगी जबकि शेष अन्य इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखी जाए।
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