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नेपाल-भारत जैसी मैत्री संभव नहीं, पूजापाठ में संकल्प लेते समय जम्मू दीपे भारत खंडे को करते हैं उच्चारित

Sat, 01 Aug 2020 01:58 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनोद काला (संवाद), अमर उजाला, बनबासा (चंपावत)
विनोद काला (संवाद), अमर उजाला, बनबासा (चंपावत) Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 01 Aug 2020 01:58 PM IST
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India Nepal treaty 70 years: Friendship like Nepal-India is not possible
भारत-नेपाल - फोटो : iStock

आदि काल से भारत नेपाल के बीच के मैत्री संबंध सनातनी हैं। रोटी-बेटी, भौगोलिक परिवेश के अलावा सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक रूप से जुड़ी मैत्री विश्व में और किसी देश के बीच नहीं है। आज भी नेपाल में सनातनी हिंदू कर्मकांड और पूजापाठ में संकल्प लेते समय जम्मू दीपे भारत खंडे को उच्चारित करते हैं।

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आध्यात्मिक आधार पर भारत नेपाल जम्मूदीप के ही खंड रहे हैं। हाल में नेपाल की ओली सरकार की चीन के साथ की नजदीकियां दोनों देशों की मैत्री को डिगा नहीं सकती हैं। विस्तारवादी सोच वाले चीन के साथ नेपाल के रिश्ते भारत की तरह मजबूत होना असंभव हैं, यह बात जितनी जल्दी नेपाल की वर्तमान सरकार समझ जाए, उसके लिए अच्छा होगा।  
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विश्व के मानचित्र में भारत-नेपाल भले ही दो राष्ट्र हों लेकिन इनकी मैत्री आज भी बेमिसाल है। दोनों देश भगवान शिव और राम को मानने वाले हैं। भारत नेपाल के बीच नागरिकों का आवागमन प्रगाढ़ मैत्री संबंधों के कारण बिना पासपोर्ट संभव है।

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नेपाल को भारत ही आना होगा

पशुपतिनाथ यानी भोले शंकर की तपस्थली, माता सीता की जन्मस्थली जनकपुरी और भगवान बुद्ध की नगरी लुम्बिनी से भारतीयों का जुड़ाव आदि काल से है। वहीं, गोरखनाथ मंदिर में आज भी गोरखाओं के वंशजों के यहां से पहली खिचड़ी चढ़ाए जाने का रिवाज है। 

कहा जाता है कि कालांतर में बाबा गोरखनाथ के अनुयायी ही गोरखा कहलाए। इतिहास साक्षी है कि भारतीय नरेशों और नेपाल नरेशों के बीच वैवाहिक संबंध रहे हैं। मैत्री के कारण ही प्रतिवर्ष बनबसा सीमा से दस से बारह लाख नेपाली नागरिक भारत में रोजगार के लिए आते हैं।

प्रतिवर्ष पांच से दस लाख नेपाली तीर्थयात्री हरिद्वार, गंगोत्री, बद्री-केदार धाम, गया पहुंचते हैं। कुंभ के अवसर पर बनबसा सीमा से करीब पंद्रह से बीस लाख नेपाली श्रद्धालु हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक तक हो आते हैं। चीन के साथ किसी भी रूप में नेपाल के भारत के समान गहरे संबंध नही हो सकते हैं।

इस पर नेपाल के नागरिकों को सोचना होगा। सीमा विवाद मामले पर तो दोनों सरकारों को आपसी बातचीत और सर्वेक्षण विभागों के जरिये समाधान किया जा सकता है, लेकिन खानपान, आचार व्यवहार, मंदिरों की आस्था, गंगा नदी की धारा आदि के लिए नेपाल को भारत ही आना होगा।

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