खुलासाः चीन सीमा पर सेना के पास संसाधन नहीं!
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केंद्र सरकार बार-बार चीन से मुकाबले का दावा करती है वहीं, उत्तराखंड में 350 किलोमीटर लंबी चीन (तिब्बत) सीमा पर ड्रैगन से मुकाबले के लिए हमारे पास संसाधन ही नहीं है।
उत्तराखंड में चीन बीते पांच वर्ष में 37 और इस साल दो बार हवाई घुसपैठ कर चुका है। लगातार मिल रही इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय सेना के पास उत्तराखंड में सीमा के करीब तोपों और अन्य बड़े हथियारों के अभ्यास के लिए फील्ड फायरिंग रेंज तक नहीं है।
सेना लंबे समय से फायरिंग रेंज के लिए जमीन तलाश रही है लेकिन कभी इको सेंसिटिव जोन तो कभी वन विभाग का अड़ंगा लग गया। जबकि चीन के सीमा पार पांच हवाई अड्डे, ल्हासा तक रेलवे लाइन है जिसका बॉर्डर तक निर्माण लगभग पूरा हो चुका है।
इसके अलावा चीन सड़कों का जाल पूरे तिब्बत में सीमा तक फैला चुका है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक चीन के पांच सैन्य माउंटेन डिवीजन सीमा के उस पार तैनात हैं। ऐसे में सीमा पार से बड़ी चुनौती मिलती है तो बिना फायरिंग रेंज के ड्रैगन से कैसे मुकाबला कर सकेंगे?
क्यों है फायरिंग रेंज की जरूरत?
फील्ड फायरिंग रेंज के लिए पहले सेना ने इसके लिए गंगोत्री वन क्षेत्र को चिह्नित किया था, लेकिन 2013 में इस क्षेत्र के ईको सेंसेटिव जोन के तौर पर अधिसूचित होने से मामला लटक गया। सेना की दूसरी पसंद नंदा देवी बायोस्फेयर की भूमि थी।
इसमें भी वन एवं वाइल्ड लाइफ की अनुमति मिलने में दिक्कतों को देखते हुए अब सेना नए सिरे से विकल्प तलाश रही है। अब सेना को गढ़वाल में 10 हजार फीट ऊंचाई वाले क्षेत्र में लगभग 50 वर्ग किलोमीटर भूमि की तलाश है।
उत्तराखंड में अब तक एक अधिग्रहीत फील्ड फायरिंग रेंज आसन (यूपी- उत्तराखंड सीमा) क्षेत्र में है। भारतीय सेना की उत्तराखंड में सैन्य विस्तार योजनाओं के तहत आर्टिलरी यूनिटों की तैनाती बढ़ाई जानी है।
चीन सीमा पर सैन्य तैनाती मजबूत करने के उद्देश्य से गठित होने वाली नई कोर के तहत सेना उत्तराखंड सहित चीन सीमा से सटे अन्य राज्यों में अपनी तैनाती बढ़ा रही है।
इसी के तहत तोपों के अभ्यास के लिए फील्ड फायरिंग रेंज की जरूरत है। सेना ने उत्तराखंड सरकार से वर्ष 2011 में हजारों एकड़ भूमि की मांग भी की थी।
फील्ड फायरिंग रेंज की भारी कमी
सेना के पास वर्ष 2012 तक 104 से 66 छोटी-बड़ी फायरिंग रेंज हथियारों के अभ्यास के लिए बची थीं, जिसमें मात्र 12 फील्ड फायरिंग रेंज अधिग्रहीत हैं।
कई राज्यों में 38 फायरिंग रेंज की अधिसूचना निरस्त करने के बाद रक्षा मंत्रालय ने बीते दो वर्षों में 15 फायरिंग रेंज का रि-नोटिफिकेशन करवा लिया है।
फील्ड फायरिंग रेंज बहुत महत्वपूर्ण हैं। यहां न केवल मोर्टार से लेकर आर्टिलरी गन्स चलाने की प्रैक्टिस होती है, बल्कि युद्ध जैसे हालात बनाकर सेना अपने सैनिकों के लिए हर तरह की फायरिंग का प्रशिक्षण देती है। स्ट्रेटजी की तैयारी होती है। हाई एल्टीट्यूड में आर्टिलरी गन्स अलग तरीके से फायर करती हैं। पर अभी हाई एल्टीट्यूड वाली केवल दो बड़ी फील्ड फायरिंग रेंज हैं। एक जम्मू-कश्मीर में और दूसरी सिक्किम में। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाके में रेंज की तलाश की जा रही है।
- ले. जनरल जीएस नेगी (रिटायर्ड)