भारत-चीन के व्यापारिक रिश्तों में अब ‘चीनी’ कम, लिपुलेख दर्रे से अंतरराष्ट्रीय व्यापार बंद होने के आसार
- प्रत्येक वर्ष व्यापार के लिए तकलाकोट मंडी जाते हैं भारतीय व्यापारी
- 1962 युद्ध के बाद 32 वर्ष तक नहीं हुआ था इस रास्ते से व्यापार
- कोविड-19 के चलते इस वर्ष नहीं हुआ व्यापार, मानसरोवर यात्रा भी इसी वजह से नहीं हो पाई
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भारत-चीन के बीच बढ़ते विवाद के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा के साथ लिपुलेख दर्रे से होने वाले भारत-चीन व्यापार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। इस वर्ष कोविड-19 के चलते इस रास्ते से भारत-चीन व्यापार नहीं हो पाया है।
भारत-चीन व्यापार में जाने वाले व्यापारियों ने भी अंदेशा जताया है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की स्थिति ऐसी ही रही तो इस रास्ते से व्यापार बंद हो सकता है। साथ ही उन्होंने देशहित में चीन से व्यापार छोड़ने की बात भी कही। मालूम हो कि पिछले कुछ सालों से आयात और निर्यात में काफी कमी आई है।
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भौगोलिक परिस्थितियां अथवा सुविधाओं की कमी और दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार में दिनों-दिन कमी आती जा रही है। समुद्र तल से 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे से होने वाले इस व्यापार की प्रमुख मंडी पिथौरागढ़ जिले का गुंजी और तिब्बत में तकलाकोट हैं।
दोनों मंडियों में दोनों देशों के व्यापारी कारोबार कर सकते हैं। बावजूद इसके भारतीय कारोबारी तो तकलाकोट जाते हैं, लेकिन चीन के व्यापारी गुंजी आने से कतराते हैं। इतना ही नहीं वर्ष 2016 के बाद इस व्यापार में आयात और निर्यात में कमी आई है। वर्तमान में यह व्यापार घटकर आधे से भी कम रह गया है। आयात लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन निर्यात में काफी कमी आई है।
वर्ष 1962 में बंद हो गया था व्यापार
भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के बीच व्यापार की परंपरा सदियों पुरानी हैं। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया था। 1992 में करीब 32 साल बाद दोनों देशों की सहमति से इसे फिर से शुरू किया गया। व्यापार के लिए एक जून से 30 सितंबर की तिथि तय है। हालांकि कई बार इसे बढ़ाकर 31 अक्तूबर कर दिया जाता है। व्यापार के दौरान सहायक ट्रेड अधिकारी गुंजी में कार्य करते हैं। शेष अवधि में धारचूला में कार्य चलता है। व्यापार संचालन के लिए कालापानी में कस्टम चौकी और गुंजी में स्टेट बैंक की शाखा भी खोली जाती है।
व्यापारी घोड़े खच्चरों से लादकर पहुंचाते है तकलाकोट सामग्री
दोनों देशों के बीच घटते व्यापार की एक बड़ी वजह व्यापारियों की समस्याएं भी हैं। चीन ने तकलाकोट मंडी तक सड़क पहुंचा दी है। चीनी व्यापारी आसानी से मंडी तक सामान पहुंचाते हैं। लेकिन भारत लिपुलेख तक वर्ष 2020 में सड़क पहुंचा पाया है। यहां पर व्यापारी घोड़े खच्चरों में सामान लादकर तकलाकोट पहुंचाते हैं। वर्षाकाल में व्यापारियों का अधिकांश सामान तकलाकोट पहुंचते-पहुंचते खराब भी हो जाता है। इससे उन्हें काफी नुकसान झेलना पड़ता है।
वर्ष 2002 के बाद नहीं आया कोई भी चीनी व्यापारी
भारत-चीन व्यापार को लेकर चीन के व्यापारियों में कोई उत्साह नहीं है। वर्ष 2002 के बाद से आज तक किसी भी चीनी व्यापारी ने व्यापार के लिए गुंजी में कदम नहीं रखा है। लेकिन भारतीय व्यापारी प्रत्येक वर्ष व्यापार के लिए चीन जाते हैं।
इन चीजों का होता है व्यापार
गुड़, मिश्री, कॉस्मेटिक सामान, एल्यूमीनियम के बर्तन, कॉफी, टाफियां, सुर्ती, ऊन, तिब्बती चाय, छिरबी, याक की पूंछ, जैकेट, कंबल, जूते, चीन निर्मित रजाइयां आदि।
पिछले आठ वर्ष भारत-चीन के बीच आयात-निर्यात रुपयों में
2012- 1.84 करोड़ 88.4 लाख
2013 - 81.58 करोड़ 1.29 करोड़
2014 - 2.48 करोड़ 1.82 करोड़
2015 - 3.26 करोड़ 62.32 लाख
2016 - 5.21 करोड़ 75.95 लाख
2017 - 7.34 लाख 87.85 करोड़
2018 - 5.34 लाख 87.86 करोड़
2019 - 1.91 करोड़ 1.25 करोड़
सदियों से दोनों देशों के बीच व्यापार की परंपरा रही है। प्रत्येक वर्ष व्यापार के लिए जाते हैं। हर जगह चीन के बहिष्कार की आवाज उठ रही हैं। व्यापार से पहले देश हित है। व्यापार छोड़ना पड़े तो वह व्यापार छोड़ने के लिए तैयार हैं।
- दिनेश गुंज्याल, उपाध्यक्ष, भारत-चीन व्यापार समिति