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इको सिस्टम के लिए खतरा बनी संकर प्रजातियां
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 30 Aug 2016 11:28 AM IST
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विदेशी आक्रांता वनस्पतियों ने बड़ी संख्या में देसी के साथ मिलकर संकर प्रजातियां पैदा कर दी हैं। ये संकर प्रजातियां इको सिस्टम के लिए खतरा बन गई हैं।
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ये प्रजातियां अपने पूर्वजों से कई गुना तेज हैं और देसी वनस्पतियों के वासस्थलों पर कब्जा कर रही हैं। इससे इको सिस्टम सर्विसेस से जुड़े कारोबार को नुकसान पहुंच रहा है।
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विदेशी आक्रांता वनस्पतियां और इनसे पैदा संकर प्रजातियां सिर्फ देसी वनस्पतियों के वासस्थलों पर कब्जा ही नहीं कर रही हैं, बल्कि जहां ये अपनी कालोनियां विकसित कर लेती हैं, वहां का जल प्रबंधन गड़बड़ हो जाता है और भूमि की केमिस्ट्री बिगड़ जाती है।
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आक्रांता संकर वनस्पतियों के दुष्प्रभाव से जैव विविधता नष्ट होने लगती है। इससे उत्पादकता का क्षय हो रहा है। इसके साथ ही देसी वनस्पतियों के नष्ट होने से इन्हें खाने वाले वन्य जीव और दूसरे जीव जंतु या तो वास स्थल छोड़कर भाग जा रहे हैं या खत्म हो रहे हैं।
शाकाहारी जीवों के न रहने से मांसाहारी वन्य जीवों की फूड चेन टूट रही है। वन अनुसंधान संस्थान ने आक्रांता वनस्पतियों से नुकसान का पूरा ब्यौरा तैयार किया है। सोमवार को इसे भारतीय वन सर्वेक्षण की कार्यशाला में प्रस्तुत किया गया। वन विज्ञानियों के सामने आक्रांता वनस्पतियों की संकर प्रजातियों को चिह्नित करना बड़ी चुनौती बन गया है।
रिपोर्ट में बताया गया कि इन प्रजातियों का बर्ताव आक्रामक होता है। मिट्टी में चाहे जितनी पानी, पोषक तत्वों की कमी हो, ये जड़ पकड़ लेती हैं।
आक्रांता वनस्पतियों की 111 प्रजातियां हिमालय और देश के अन्य स्थानों में सक्रिय हैं, लेकिन इनकी संकर प्रजातियों की संख्या हजारों में पहुंच रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे आर्थिक क्षति पहुंच रही है। 20 फीसदी फसलें ये बर्बाद कर दे रही हैं। इससे वनों से जुड़ा कारोबार प्रभावित हो रहा है।
कुछ आक्रांता प्रजातियां
लैंटाना, एगररैटम कोनीजोइडीस, बिडेनस्पीलोसा, कैसिया आक्सीडेंटेलिस, कैसिया टोरा, क्रोमोलेइनाओडोराटा, साइप्रस, रोटनडस, एक्लीप्टाप्रोस्ट्रेटा, यूपेटोरियम, एडीनोफोरम, यूफोरबिया हिरटा, हाइपटिश्यूएवियोलेंस आदि।
आक्रांता विदेशी वनस्पतियों की बड़ी संख्या में संकर प्रजातियां पैदा हो गई हैं। खासतौर पर जहां देसी वनस्पतियों के वासस्थलों में गिरावट आती है, वहां ये तेजी से कब्जा कर लेती है। इनके दूरगामी दुष्प्रभाव होंगे।
- डॉ. सविता, निदेशक वन अनुसंधान संस्थान