हिंदी से इतना प्यार कि उठाया ऐसा कदम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिंदी के विरोध में कई बार दक्षिण भारत में आवाज बुलंद हुई है। इसमें तमिलनाडु राज्य में विरोध ज्यादा तीखा रहा है। लेकिन तमिलनाडु निवासी रमेश को हिंदी से खूब लगाव है। आज फर्राटेदार हिंदी बोलने वाले रमेश एमएससी तक हिंदी का ककहरा तक नहीं जानते थे।
अपने हिंदी प्रेम के चलते ही उन्होंने हिंदी भाषी महिला से शादी की। अपने जज्बे से उन्होंने महज एक वर्ष में न केवल हिंदी सीखी, बल्कि अब वह दूसरों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। उत्तराखंड के चंपावत नवोदय विद्यालय के शिक्षक रमेश एमएससी हैं।
एमएससी तक वे सिर्फ तमिल और अंग्रेजी जानते थे। हिंदी से उनका कोई वास्ता नहीं था। बताते हैं कि वह हिंदी की वर्णमाला तक से वाफिक नहीं थे, लेकिन 1997 में उड़ीसा में पहली तैनाती के दौरान उनमें उड़िया के साथ हिंदी को सीखने की ललक जागी। उड़िया बोलने वाले तो वहां ज्यादातर लोग थे, लेकिन हिंदी जानने के लिए उन्होंने खूब मेहनत की।
हिंदी भाषी महिला से किया विवाह
आखिरकार व्याकरण, हिंदी भाषा की पुस्तकों से लेकर हिंदी समाचार पत्र और हिंदी फिल्मों को देख उनकी समझ बढ़ी। उनका कहना है कि हिंदी प्रेम से उन्होंने हिंदी भाषी महिला से विवाह किया। उनकी छठी में पढ़ने वाली बेटी आर तनीस का हिंदी में अच्छा कमांड है।
रमेश का कहना है कि हिंदी देश की एकता की धुरी तो है मगर अब इसे अधिक रोजगारपरक बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। प्राचार्या वीनू जैन कहती हैं कि शिक्षक रमेश अब बेहतरीन हिंदी बोलते हैं।
हिंदी उच्चारण के लिए छात्रों से मदद ले रहीं बोरनाली
असम की रहने वालीं शिक्षिका बोरनाली कुंवर 2010 में जब चंपावत जवाहर नवोदय स्कूल आईं, तो हिंदी बोल नहीं पाती थीं, लेकिन चार वर्ष में ही उनका भाषाई ज्ञान समृद्ध हो गया। अब वह हिंदी बोलती ही नहीं बल्कि छात्रों को विषयवस्तु समझाने के लिए अंग्रेजी के साथ हिंदी का भी उपयोग करती हैं।
अर्थशास्त्र की शिक्षिका बोरनाली को अभी भी हिंदी के कई शब्दों के उच्चारण में दिक्कत आती है, जिसे ठीक करने के लिए वह व्याकरण की पुस्तकें, निबंध और हिंदी अखबार पढ़ती हैं। साथ ही सहयोगी शिक्षकों के अलावा छात्र-छात्राओं से भी मदद लेती हैं। अधिकारपूर्वक हिंदी बोलने से गदगद बोरनाली अब अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित कर रही हैं।
सात बार लिख दी हनुमान चालीसा
जर्मनी निवासी बालत्राउत हिंदी बोलने में माहिर ही नहीं हो गई हैं, बल्कि उन्होंने हनुमान चालीसा को सात बार लिख भी दिया है। उन्होंने बताया कि वह कई बार भारत आ चुकी हैं। अब वह हिंदी में शिव चालीसा भी लिखने जा रही हैं। उनका कहना है कि हिंदी से उनका लगाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा है।
जापान निवासी आया इन दिनों ऋषिकेश के स्वर्गाश्रम घूमने आई हैं। बताया कि पहली यात्रा में यहां की भाषा दिल को छू गई। मन में हिंदी बोलने और जानने की इच्छा जागृत हुई। हिंदी को सीखाने में स्थानीय लोगों ने उनकी बहुत मदद की। अब वह हिंदी बोल और समझ लेती हैं, हालांकि लिखना थोड़ा बहुत ही आता है।
देसी गुरु से विदेशी चेले सीख रहे हिंदी
मुनिकीरेती में यहां हिंदी की पाठशाला रोज चलती है। इस पाठशाला में देसी गुरु विदेशी चेलों को अ आ इ ई का पाठ पढ़ा रहे हैं। हिंदी पढ़ना और बोलना सीखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी यहां आते हैं। बात हो रही तीर्थनगरी ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला क्षेत्र की। यहां विदेशी हिंदी में पारंगत हो रहे हैं।
कई विदेशी ऐसे भी हैं, जिनके हिंदी के उच्चारण बेहद स्पष्ट हो गए हैं। एक ओर जहां भारतीय राष्ट्र भाषा को छोड़ अंग्रेजी की ओर आकर्षित हो रहे हैं, वहीं कई विदेशी नागरिक ऐसे हैं जिनका हिंदी के प्रति लगाव उन्हें सात समुंदर पार से यहां खींच लाया है। यही नहीं वेद और उपनिषदों के रहस्यों को जानने के प्रति इनका रुझान भी देशवासियों को आईना दिखाने का काम कर रहा है।
क्या कहते हैं हिंदी के गुरुजी...
कुछ विदेशी लक्ष्मणझूला में हिंदी शिक्षक ओमप्रकाश की कक्षा में पढ़ रहे हैं। ओमप्रकाश ने बताया कि इंग्लैंड निवासी रेदेका को भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा से बहुत लगाव है। रामायण, महाभारत और वेद उपनिषद के बारे में जानने को वे उत्सुक रहते हैं। उन्होंने उन्हें रामायण भेंट की है। बताया कि वे सुबह और शाम के समय कक्षाएं चलाते हैं।