Himalaya Crisis Series: हिमालय में सुरंगों का जाल बन न जाए जंजाल, पर्यावरणविद् चिंतित, भूकंप बन सकता है खतरा
पहाड़ की रीढ़ चार धाम ऑल वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन, 600 हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट, दून-टिहरी 32 किलोमीटर सुरंग, टनल पार्किंग से कमजोर जा सकती है। पर्यावरणविद् चिंतित है कि भविष्य में 6000 से ज्यादा गांवों की आबादी सुरंगों पर आ जाएगी और भूकंप खतरा बन सकता है।
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विस्तार
सुरंगों का ऐसा जाल
ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन : ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन 125 किलोमीटर की है। इसका 105 किमी हिस्सा सुरंग से होकर गुजरेगा। इसके लिए 16 सुरंगों का निर्माण तेजी से चल रहा है।
हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट: उत्तराखंड की स्थापना के वक्त करीब 200 हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 600 पार हो गई है। इन प्रोजेक्ट से ही करीब 1700 से 1800 किलोमीटर सुरंगें बनेंगीं।
टनल पार्किंग : प्रदेश में करीब 12 जगहों को चिन्ह्ति किया गया है, जहां पहाड़ के भीतर टनल पार्किंग बनाई जाएगी। इसकी डीपीआर तैयार हो रही है। कुल मिलाकर इसमें भी पहाड़ का कोई किलोमीटर हिस्सा सुरंग में बदल जाएगा।
चारधाम ऑल वेदर रोड : चारधाम सड़क परियोजना में भी दो बड़ी सुरंग बननी हैं। टिहरी के चंबा में बन रही सुरंग की लंबाई 440 मीटर है। यमुनोत्री हाईवे पर गंगा और यमुना घाटी को जोड़ने के लिए भी साढे़ चार किलोमीटर लंबी सुरंग बननी है।
दून से टिहरी सुरंग : देहरादून के रायपुर से टिहरी बांध तक करीब 32 किमी की सुरंग बननी है, जिसका सर्वेक्षण का काम तेजी से चल रहा है।
गंगोत्री-यमुनोत्री रेल लाइन: गंगोत्री-यमुनोत्री रेल लाइन का प्रस्ताव चल पड़ा है। इसमें करीब 70 फीसदी रेल लाइन सुरंगों के माध्यम से ही आगे बढ़ाने की योजना है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन पर बनने वाली सुरंगें
ढालवाला से शिवपुरी-10.850 किमी
शिवपुरी से गूलर-6.470 किमी
गूलर से व्यासी-6.720 किमी
व्यासी से कौड़ियाला-2.200 किमी
कौड़ियाला से बागेश्वर-9.760 किमी
राजचौरा से पौड़ी नाला-220 मीटर
पौड़ी नाला से सौड़ (देवप्रयाग)-1.230 किमी
सौड़ से जनासू-15.100 किमी
लछमोली से मलेथा-2.800 किमी
मलेथा से नैथाणा (श्रीनगर)-4.120 किमी
श्रीनगर से परासू (धारी)-9.000 किमी
परासू से नरकोट-7.080 किमी
नरकोट से तिलनी-9.420 किमी
तिलनी से घोलतीर-6.460 किमी
घोलतीर से गोचर-7.160 किमी
रानो से सिवई-6.400 किमी
व्यासी परियोजना: 120 मेगावाट
लखवाड़ परियोजना: 300 मेगावाट
किशाऊ परियोजना: 660 मेगावाट
बावला नंदप्रयाग परियोजना: 300 मेगावाट
सिरकारीब्योला, रूपसियाबगड़: 120 मेगावाट
सेलाउर्थिंग जल विद्युत परियोजनाएं: 202 मेगावाट
पाला मनेरी परियोजना: 480 मेगावाट
टमक लता परियोजना: 280 मेगावाट
सेला पिथौरागढ़: 230 मेगावाट
तपोवन विष्णुगाड़- 530 मेगावाट
विष्णुगाड़-पीपलकोटि- 444 मेगावाट
सुरंगों के साइड इफेक्ट
-तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना में सुरंग रिसाव के कारण 2011, 2012 में काम रोका। 2019 में दोबारा काम शुरू हुआ। 11 किमी की सुरंग है।
-444 मेगावाट की विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना में 13.4 किमी लंबी सुरंग है, जो बीते दिनों आपदा का शिकार हुई।
-पर्यावणविदों की मानें तो जहां भी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की सुरंग बन रही है, वहां काफी जगहों पर ऊपरी क्षेत्रों के गांवों में घरों में दरारें आ रही हैं।
सुरंगों के यह फायदे
-जल विद्युत परियोजनाओं में सुरंग बनाने से ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी कमी दूर हो सकती है।
-रेल लाइन सुरंग से गुजरने पर बरसात के मौसम में भू-स्खलन आदि का खतरा नहीं होगा। रेल सेवा चलेगी, जिससे पर्यटक, तीर्थयात्रियों की संख्या भी बढ़ेगी।
-पहाड़ में बरसात के सीजन में रोड कनेक्टिविटी की चुनौती भी दूर होगी।
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सुरंगों से होने वाला विकास, विनाश की तरफ धकेलेगा
सरकार पहाड़ की रीढ़ को कमजोर कर रही है। मध्य हिमालयी क्षेत्र में आने वाला उत्तराखंड बाढ़-भूस्खलन, भूकंप की जद में है। सरकार की योजनाएं आने वाले समय में 6000 से अधिक गांवों को सुरंगों के ऊपर पहुंचा देंगी। आज भी जो सुरंगें बन रही हैं, उनका दुष्प्रभाव ऊपर के पहाड़ी क्षेत्रों में मकानों में दरारों के रूप में नजर आने लगा है। इन सारे खतरों को समझने के बावजूद सरकार नजरअंदाज कर रही है। सुरंगों के इस विकास की रफ्तार को हमें रोकना होगा। -सुरेश भाई, पर्यावणविद्