Himalaya Diwas 2020: हिमालय संरक्षण के 10 साल का सफर पूरा, इस मुहिम में अब सबको साथ लाने की बनेगी रणनीति
- इस बार सबको साथ में लाने की बनेगी रणनीति, दिया जा सकता है नया नारा
- मुख्य आयोजन दिल्ली में, उपराष्ट्रपति सहित कई केंद्रीय मंत्री भी होंगे शामिल
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विस्तार
हिमालय दिवस के जरिये हिमालय के संरक्षण की मुहिम अब दस साल पूरे कर चुकी है। मुद्दों पर पड़ी धूल की परत को साफ कर अब मुहिम कुछ ठोस हासिल करने की ओर है। इस बार कोरोना के कारण उत्तराखंड सरकार ने किसी बड़े आयोजन को नहीं किया, लेकिन हिमालय संरक्षण के जज्बे के आगे आखिरकार कोरोना को भी हार माननी पड़ी है। इस बार हिमालय दिवस का हॉट स्पॉट दिल्ली है। उपराष्ट्रपति एम.वैंकेया नायडू, केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक सहित अन्य कई केंद्रीय मंत्री इस बार हिमालय के संरक्षण पर मंथन करेंगे।
हिमालय सबका है। इसे बचाने के लिए हर किसी को सामने आना होगा। इस बार हिमालय दिवस पर यही संदेश देने की तैयारी भी की जा रही है। हिमालय के सामने आज उठ खड़ा हुआ संकट किसी से छुुपा नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय का स्वभाव बदल रहा है। मौसम आंख मिचौली खेल रहा है। भारतीय हिमालय क्षेत्र के 26 बढ़े ग्लेश्यिर इससे प्रभावित हैं। नदियों पर इसके कारण संकट है। खेती पर विपरीत असर है। सदियों से सुरक्षित माने जाने वाले गांव और शहर प्राकृतिक आपदाओं के कारण असुरक्षित हो गए हैं।
इतनी चिंता होने के बाद भी अभी तक हिमालय के संरक्षण की मुहिम कुछ खास दिन और वर्ग तक ही सीमित रही। 2019 में हिमालय राज्यों ने एकजुट होने की पहल की थी।इस बार एकजुटता की ये मुहिम अब और आगे बढ़ सकती है। जानकारी के मुताबिक इस बार के दिल्ली में आयोजित मुख्य आयोजन में सभी वर्गों को साथ में लेने की रणनीति तय की जा सकती है। हैस्को के संस्थापक निदेशक अनिल जोशी के मुताबिक हिमालय संरक्षण की मुहिम को सिर्फ कुछ राज्यों तक सीमित न रहने देने पर भी बात की जाएगी।
आयोजन में हिमालय संरक्षण के लिए अधिक जानकारी जुटाने, नए शोध और समस्याओं को भली भांति समझने के लिए नए प्रस्तावों पर भी बात की जा सकती है। 2006 में योजना आयोग की ओर से गठित माउंटेन टास्क फोर्स ने भी यह मामला उठाया था। टास्क फोर्स ने एक अंब्रेला संस्थान का सुझाव भी दिया था। पर्वतीय राज्यों की ग्रीन बोनस की मांग पुरानी है और इस पर हर बार बात भी होती है। अब हिमालयी राज्य ग्रीन अकांउटिंग के जरिये पुख्ता दावे के साथ मैदान में हैं। 15वें वित्त आयोग ने वनों को अधिमान देकर राज्यों के इस दावे को कुछ हद तक स्वीकार भी किया है।
दस साल का सफर पूरा
वैसे तो संरक्षण हिमालय की प्रकृति में ही शामिल है। यही गुुण हिमालय की गोद में पलने वाले लोगों का भी है। चिपको से लेकर मैती, अन्य कई आंदोलनों और अब हरेला से यह साबित भी हुआ है।
इतना होने पर भी हिमालय दिवस राज्य के गठन के बाद की उपज है। आंदोलन से उपजे राज्य को तेज विकास की दरकार थी। यह कोशिश राजनीतिक रूप से औद्योगिक विकास के रूप में सामने भी आई, लेकिन इसने मैदान और पहाड़ में विषमता का बीज भी बो दिया। प्रदेश के कुछ हिस्से पीछे छूट गए। विकास के विमर्श से हिमालय संरक्षण की एक और मुहिम निकली।
जानकारों के मुताबिक 2010 में सुंदरलाल बहुगुणा, राधा बहन और अनिल जोशी की संयुक्त कोशिश से हिमालय दिवस का आयोजन हुआ। इसके बाद यह काफिला बढ़ता ही चला गया। हिमालय दिवस के आयोजनों में कुछ झिझकते और कुछ ठिठकते हुए सरकार भी शामिल हुई। गैर सरकारी संगठन भी सामने आए।
2014 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने हिमालय दिवस को आधिकारिक रूप से मनाने की घोषणा की। यह अकारण नहीं है कि उस समय तत्कालीन प्रदेश सरकार की इस घोषणा को विपक्ष ने हाथों-हाथ लिया, बल्कि यह प्रस्ताव ही विपक्ष की ओर से आया था।
2019 में इस मुहिम ने एक मुकाम और हासिल किया। प्रदेश सरकार ने मसूरी में 11 हिमालयी राज्यों का कान्क्लेव आयोजित किया। इसी से उपजा हिमालय बचाओ का मसूरी घोषणा पत्र। इस घोषणा पत्र में सभी पर्वतीय राज्यों ने एकजुट होकर हिमालय की रक्षा का संकल्प लिया, एक दूसरे से तकनीक और प्रौद्योगिकी के आदान प्रदान पर सहमति जताई और केंद्र से ग्रीन बोनस, अलग पर्वतीय मंत्रालय आदि की मांग की।
पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली अपनाएं, करें हिमालय की मदद
प्रदेेश के लोगों को हिमालय संरक्षण के लिए शत-प्रतिशत योगदान करना चाहिए। हिमालय सिर्फ पर्वतमाला ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का महान केंद्र भी है। सरकार के साथ ही स्कूलों, कालेजों और सभी सामाजिक संगठनों को सक्रिय होना होगा। हिमालयी क्षेत्र की जड़ी-बूटियां, वनस्पतियां आदि के संतुलित उपयोग, संरक्षण और संवर्धन के साथ ही नदियों की सफाई, जल स्रोतों के पुनर्जीवन पर भी ध्यान देना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक और इससे निर्मित पदार्थों, पॉलीथीन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। हम अपनी जीवन शैली में सकारात्मक बदलाव कर, पर्यावरण अनुकूल उपायों को अपना कर हिमालय संरक्षण की दिशा में अपना योगदान दे सकते है।
- बेबीरानी मौर्य, राज्यपाल उत्तराखंड
हिमालय के संरक्षण के लिए सभी को आना होगा साथ
अब यह महसूस किया जा रहा है कि हिमालय के संरक्षण में सभी को साथ आना होगा। हिमालय हमारे लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में हिमालय के संरक्षण की मुहिम किसी एक की नहीं हो सकती। इसमें हर संबंधित पक्ष का साथ हासिल करना होगा। यही वजह है कि इस बार हिमालय दिवस के आयोजन में हिमालय और प्रकृति की थीम भी चुनी गई है। इस आयोजन के जरिये एक नया नारा भी सामने आएगा। इस नारे को जानने के लिए आपको थोड़ा इंतजार करना होगा। इस नारे के मूूल में भी यही बात है कि हिमालय के संरक्षण के लिए प्रत्येक वर्ग का साथ लेना होगा। नई शिक्षा नीति में भी पर्यावरण संरक्षण को खासी तवज्जो दी गई है। सब मिल कर काम करेंगे तो बेहतर परिणाम भी सामने आएंगे।
- डा. रमेश पोखरियाल निशंक, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और हरिद्वार सांसद
हिमालय के संरक्षण को सामाजिक चेतना और सामूहिक प्रयास जरूरी
हिमालय न केवल भारत बल्कि विश्व की बहुत बड़ी आबादी को प्रभावित करता है। हिमालय के सुरक्षित रहने पर ही इससे निकलने वाली सदानीरा नदियां भी सुरक्षित रह पाएंगी। हिमालय की नदियों का जल और हिमालय की जलवायु पूरे देश को एक सूत्र में बांधती है। हिमालय के संरक्षण की पहली जिम्मेदारी भी हमारी है। इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, नदियों एवं वनों का भी संरक्षण आवश्यक है। इसलिए जल संरक्षण, संवर्धन तथा व्यापक स्तर पर पौधरोपण राज्य सरकार की प्राथमिकता है। यही नहीं हिमालय संरक्षण के लिए हमने राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम भी चलाई। मसूरी में आयोजित हिमालय कॉन्क्लेव इसका प्रमाण है। पर्यावरण में हो रहे बदलाव, ग्लोबल वार्मिंग, जल-जंगल-जमीन से जुड़े विषयों पर समेकित चिंतन, सामाजिक चेतना और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। रिस्पना, कोसी जैसी नदियों के पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास किए जाने के साथ ही गंगा, यमुना व उनकी सहायक नदियों की स्वच्छता के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखंड
हिमालय के लिए अब अलग नीति बनाने की जरूरत
हिमालय के लिए अब अलग से नीति बनाने की जरूरत है। हिमालय में बड़े निर्माण कार्यों से जल स्रोत, तालाब और चाल-खाल को भी नुकसान पहुंच रहा है। हिमालय में बेहद चौड़ी सड़कों के कारण बिगड़ती स्थिति को समझना भी जरूरी हो गया है। हिमालय दिवस पर हम सबसे पहले निवेदन करना चाहते हैं कि हिमालय की कमजोर पर्वतमालाओं के विषय पर विचार किया जाए। जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए स्थानीय सहयोग से स्थायी विकास का मॉडल तैयार होना चाहिए। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान की ओर से हिमालय बचाने की पहल पर ध्यान देकर अलग हिमालय नीति बनाने की जरूरत है।
- सुरेश भाई, पर्यावरणविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता