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यहां बसा बौने पौधों का संसार
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वसंत विहार निवासी रिटायर्ड मेजर अशोक कुमार ने बना रखा है बौन्जाई पौधों का गार्डन।
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शहर में मेजर अशोक कुमार (रिटायर्ड) ने बौने पौधों का पूरा ‘संसार’ बसा रखा है। ऐसा ‘संसार’ जिसमें बरगद और पीपल जैसे पेड़ भी बौनी शक्ल में नजर आते हैं। हम बात कर रहे हैं मेजर अशोक के बोन्जाई गार्डन की। उनके इस जुनून को देश ही नहीं दुनिया के कई देश सलाम कर रहे हैं। जापान ने तो पूरी दुनिया में उनके बोन्जाई पौधों को प्रथम पुरस्कार से नवाजा था।
शौक बना जुनून
वसंत विहार निवासी मेजर अशोक सेना में चोटिल होने के बाद दिव्यांगता का शिकार हो गए थे। लिहाजा, उन्होंने सेना से वीआरएस ले लिया। उसके बाद उन्होंने ओएनजीसी ज्वाइन किया। एक बार जब वह अमेरिका गए तो उन्होंने वहां बोन्जाई पौधे देखे थे। वहीं से उन्हें इनका शौक पैदा हुआ। घर आए तो पौधों को बोन्जाई बनाने का अभ्यास शुरू किया। आसान न था, लेकिन खुद किताबें पढ़ी। बोन्जाई की दुनिया को समझा और शुरू हो गए। अब 35 साल बीत गए। आज उनकी बगिया को 60 से ज्यादा प्रजातियों के पौधे महका रहे हैं।
जापान ने माना था दुनिया का श्रेष्ठ बोन्जाई
मेजर अशोक ने जो बोन्जाई तैयार किए हैं, उन्हें वर्ष 2006-07 में जापान में हुए वर्ल्ड बोन्जाई कांटेस्ट में शामिल किया गया था। अपने दो बोन्जाई की 3-डी तस्वीरें उन्होंने इस प्रतियोगिता में भेजी। दुनियाभर से आई एंट्री में से मेजर अशोक के दो बोन्जाई को दुनिया के श्रेष्ठ बोन्जाई माना गया। मेजर अशोक ने बताया कि इनमें से फाइकल लॉंग आईलैंड और फाइकस इक्विस्टी फोलिया बोन्जाई ने यह अवार्ड जीता था।
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जुरासिक युग का पौधा भी बोन्जाई
मेजर अशोक के एक गमले में जुरासिक युग का जिंको बाइलोबा पौधा भी बोन्जाई रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि जुरासिक युग की यह अकेली प्रजाति मानी जाती है। बताया, जब आजादी के बाद अंग्रेज देहरादून छोड़कर गए थे तो शहर में केवल 16 पौधे ही इस प्रजाति के बचे थे। उन्होंने विशेष प्रयास करके ही इसकी प्रजाति को बोन्जाई बनाया है। अब शहर में कई जगहों पर जिंको बाइलोबा की प्रजाति देखी जा सकती है।
जापान में है आठ करोड़ का बोन्जाई
बोन्जाई का क्रेज और इसके दाम सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे। वर्ष 2013 में जापान में दुनिया का सबसे महंगा बोन्जाई बिका था। इसकी कीमत 1.3 मिलियन डॉलर यानी आठ करोड़ रुपये से ऊपर थी। जापान में ही दुनिया का दूसरा सबसे महंगा बोन्जाई है, जिसकी कीमत 90 हजार डॉलर यानी करीब 61 लाख रुपये है। हालांकि मेजर अशोक ने अपने इस शौक को आज तक कमाई के रूप में नहीं बदला। लिहाजा, वह अपने बोन्जाई बेचते नहीं हैं।
साधना की तरह है बोन्जाई को तैयार करना
बोन्जाई गार्डन में पीपल, बरगद, बोतल ब्रुश जैसे भारी-भरकम पौधे भी गमले में सिमटे नजर आते हैं। इतना ही इन्हें इन्हें तैयार करना साधना की तरह है। एक सामान्य पौधे को बौना बनाने में कई-कई साल तक का समय लग जाता है। मेजर अशोक ने बोन्जाई का काम खुद सीखा। उन्होंने बताया बोन्जाई बनाने के लिए पौधे की लगातार कटिंग के अलावा उसे रस्सियों से बांधा जाता है। उसकी मिट्टी एक निश्चित समय के अंतराल पर बदली जाती है। उनके पास अभी 40 से 50 साल पुराने बोन्जाई उपलब्ध हैं।
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शौक बना जुनून
वसंत विहार निवासी मेजर अशोक सेना में चोटिल होने के बाद दिव्यांगता का शिकार हो गए थे। लिहाजा, उन्होंने सेना से वीआरएस ले लिया। उसके बाद उन्होंने ओएनजीसी ज्वाइन किया। एक बार जब वह अमेरिका गए तो उन्होंने वहां बोन्जाई पौधे देखे थे। वहीं से उन्हें इनका शौक पैदा हुआ। घर आए तो पौधों को बोन्जाई बनाने का अभ्यास शुरू किया। आसान न था, लेकिन खुद किताबें पढ़ी। बोन्जाई की दुनिया को समझा और शुरू हो गए। अब 35 साल बीत गए। आज उनकी बगिया को 60 से ज्यादा प्रजातियों के पौधे महका रहे हैं।
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जापान ने माना था दुनिया का श्रेष्ठ बोन्जाई
मेजर अशोक ने जो बोन्जाई तैयार किए हैं, उन्हें वर्ष 2006-07 में जापान में हुए वर्ल्ड बोन्जाई कांटेस्ट में शामिल किया गया था। अपने दो बोन्जाई की 3-डी तस्वीरें उन्होंने इस प्रतियोगिता में भेजी। दुनियाभर से आई एंट्री में से मेजर अशोक के दो बोन्जाई को दुनिया के श्रेष्ठ बोन्जाई माना गया। मेजर अशोक ने बताया कि इनमें से फाइकल लॉंग आईलैंड और फाइकस इक्विस्टी फोलिया बोन्जाई ने यह अवार्ड जीता था।
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जुरासिक युग का पौधा भी बोन्जाई
मेजर अशोक के एक गमले में जुरासिक युग का जिंको बाइलोबा पौधा भी बोन्जाई रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि जुरासिक युग की यह अकेली प्रजाति मानी जाती है। बताया, जब आजादी के बाद अंग्रेज देहरादून छोड़कर गए थे तो शहर में केवल 16 पौधे ही इस प्रजाति के बचे थे। उन्होंने विशेष प्रयास करके ही इसकी प्रजाति को बोन्जाई बनाया है। अब शहर में कई जगहों पर जिंको बाइलोबा की प्रजाति देखी जा सकती है।
जापान में है आठ करोड़ का बोन्जाई
बोन्जाई का क्रेज और इसके दाम सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे। वर्ष 2013 में जापान में दुनिया का सबसे महंगा बोन्जाई बिका था। इसकी कीमत 1.3 मिलियन डॉलर यानी आठ करोड़ रुपये से ऊपर थी। जापान में ही दुनिया का दूसरा सबसे महंगा बोन्जाई है, जिसकी कीमत 90 हजार डॉलर यानी करीब 61 लाख रुपये है। हालांकि मेजर अशोक ने अपने इस शौक को आज तक कमाई के रूप में नहीं बदला। लिहाजा, वह अपने बोन्जाई बेचते नहीं हैं।
साधना की तरह है बोन्जाई को तैयार करना
बोन्जाई गार्डन में पीपल, बरगद, बोतल ब्रुश जैसे भारी-भरकम पौधे भी गमले में सिमटे नजर आते हैं। इतना ही इन्हें इन्हें तैयार करना साधना की तरह है। एक सामान्य पौधे को बौना बनाने में कई-कई साल तक का समय लग जाता है। मेजर अशोक ने बोन्जाई का काम खुद सीखा। उन्होंने बताया बोन्जाई बनाने के लिए पौधे की लगातार कटिंग के अलावा उसे रस्सियों से बांधा जाता है। उसकी मिट्टी एक निश्चित समय के अंतराल पर बदली जाती है। उनके पास अभी 40 से 50 साल पुराने बोन्जाई उपलब्ध हैं।