यहां दरक रहा बसपा का दलित-मुसलिम गठजोड़
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शुक्रवार को मायावती की रैली में अपेक्षा से कम जुटी भीड़ और उसमें भी अप्रत्याशित रूप से मुसलमानों की कम भागीदारी ने बसपा के थिंक टैंक की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
यह माना जा रहा है कि बदली परिस्थितियों में दलित समुदाय यदि कोई फैसला लेता है तो किसी भी राजनीतिक दल की तकदीर का फैसला हो सकता है।
निर्णायक भूमिका में है दलित मतदाता
चूंकि रुड़की का इलाका पश्चिमी यूपी से सटा हुआ है इसलिए यहां दलित समुदाय का रुख करीब-करीब वैसा ही रहता है। बताते हैं कि यूपी में इस बार दलितों का रुझान पूरी तरह से बसपा के साथ ना दिखकर भाजपा के साथ भी दिखा है।
यह पैटर्न यहां कुछ हद तक कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकता है। लिहाजा कांग्रेस को अपनी रणनीति में कुछ बदलाव करना पड़ेगा।
हरिद्वार संसदीय क्षेत्र में सवा दो लाख से ज्यादा दलित मतदाता हैं। निर्णायक भूमिका निभाने वाले इस समुदाय के कंधों पर बसपा का भाग्य टिका है। लेकिन इस बार यह वर्ग भ्रमित सा दिख रहा है।
ये है यहां बसपा की कमजोरी
हरिद्वार जिले में कुल 11 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से झबरेड़ा, भगवानपुर व ज्वालापुर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें से एक भाजपा व दो बसपा के कब्जे में हैं।
जिले में सुरेंद्र राकेश बड़े जनाधार वाले दलित नेता हैं। वह इस समय राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं लेकिन बसपा से निलंबित भी हैं। हो सकता है कि बसपा का कुछ कैडर वोट सुरेंद्र राकेश से छिटक जाए लेकिन यह भी सच है कि इस समाज में उनकी स्वीकार्यता है।
सुरेंद्र राकेश खुद पर्दे के पीछे से हैं लेकिन परिवार समेत पूरी टीम कांग्रेस प्रत्याशी रेणुका रावत के लिए काम कर रही है। यही स्थिति झबरेड़ा से बसपा के निलंबित विधायक हरिदास की है।
तो भाजपा को होगा फायदा
वैसे तो दलितों को लखनऊ से लेकर देहरादून तक बसपा का वोट बैंक माना जाता है। पिछले दो दशक में हुए तमाम चुनावों में यह बात साबित भी हुई है। दलित वोट के दम पर ही उत्तराखंड में कभी आठ विधायक बसपा के होते थे। लेकिन अब महज तीन हैं।
बसपा ने भले ही यह सीट कभी नहीं जीती हो लेकिन मुख्य मुकाबले में हमेशा रही। मगर अहम बात यह है कि मायावती की रैली के बाद दलित समुदाय को यह आभास हो गया है कि मुसलमान वोटों का झुकाव कांग्रेस की ओर है और वह इससे चिंतित भी दिखता है।
पिछले चुनाव में अपर कास्ट मुसलिम और दलितों के एक बड़े हिस्से की बदौलत हरीश रावत संसद तक पहुंच गए थे। इसमें काजी निजामुद्दीन जैसे कई क्षेत्रीय क्षत्रपों का योगदान भी रहा। लेकिन इस बार यदि दलित मतों का पश्चिमी यूपी वाला ट्रेंड कुछ हद तक हरिद्वार में भी आया तो इसका फायदा भाजपा उठा सकती है।
ऋषिकेश, डोईवाला और हरिद्वार की अहमियत
हरिद्वार संसदीय सीट को लेकर इस समय प्रदेश में सबसे ज्यादा सट्टेबाजी हो रही है। कोई कांग्रेस प्रत्याशी रेणुका रावत को जिताता है तो कोई भाजपा के निशंक को। लेकिन एक अलग तरह का ‘मैकेनिज्म’ भी है।
माना जा रहा है कि मुसलमान वोटों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस को जाएगा। मगर कांग्रेस के रणनीतिकारों की निगाह अब उन सीटों पर भी हैं जहां मुसलिम निर्णायक स्थिति में नहीं है।
मसलन, हरिद्वार शहर, ऋषिकेश व डोईवाला विधानसभा सीट पर कुल मिलाकर 8-10 हजार मुसलिम वोट हैं। और, यह भी सच है कि यदि इन सीटों पर कांग्रेस ने बढ़त ली तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है। निशंक खुद डोईवाला से विधायक हैं।
कांग्रेस के गढ़ में ही बढ़ रही चुनौती
हरिद्वार ग्रामीण क्षेत्र की सीटों को कांग्रेस के गढ़ माना जा रहा है। लेकिन उन क्षेत्रों में पिछले एक सप्ताह के भीतर मतों के विभाजन की बात ने कांग्रेस कैंप व मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए चिंता बढ़ाई है। गुर्जर, जाट, सैनी आदि बाहुल्य गांवों में विभाजन साफ दिख रहा है।
80 गांवों के प्रधानों को घोषित तौर पर अपने साथ जोड़ने के बाद से यह स्थिति पैदा हुई। क्योंकि किसी गांव के मौजूदा प्रधान के दल विशेष के साथ जुड़ने के बाद उसी गांव की आधी आबादी के बिदकने का खतरा बना रहता है जिसने पिछले पंचायत चुनाव में प्रधान के खिलाफ वोट किया था।
खेड़ाजट्ट, लिब्बरहेड़ी, खानपुर, सुल्तानपुर आदि गांवों में इसका असर साफ देखा जा रहा है। ब्राह्मणों का झुकाव भाजपा की तरफ दिख रहा है।