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राज्य सरकारों की मदद से लागू होगी सकल पर्यावरणीय उत्पाद व्यवस्था: प्रो. के विजय राघवन

Thu, 05 Mar 2020 10:24 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 05 Mar 2020 10:24 PM IST
सार

  • केंद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार ने गिनायी प्राथमिकताएं
  • कहा, जीईपी के तहत नदियों के संरक्षण पर सरकार का फोकस
  • ग्रीन जीडीपी को बढ़ाने की भी वकालत, गांव स्तर पर उतारनी होगी योजनाएं

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Gross environmental product system will be implemented with  state governments help
- फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. के विजय राघवन का कहना है कि राज्य सरकारों की मदद से सकल पर्यावरणी उत्पाद यानी जीईपी व्यवस्था को लागू कराया जाएगा। जीईपी के तहत नदियों के संरक्षण पर जोर दिया जाएगा। जिसके लिए नीतियां बनानी होगी। भारतीय वन्यजीव संस्थान में सकल पर्यावरणीय उत्पाद पर आयेाजित सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंचे प्रो. राघवन ने कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता पर्यावरण संरक्षण होना चाहिए।

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ग्रीन जीडीपी को बढृाने की वकालत करते हुए प्रो. राघवन ने कहा कि नीति निर्माताओं को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। कारण कि देश का विकास भी जरूरी है लेकिन यह ध्यान रहें कि पर्यावरण संरक्षण प्रभावित न हो।
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कहा कि जीईपी को लेकर केंद्र सरकार के पास काफी डाटा है तो राज्य सरकारों के साथ साझा किया जाएगा। प्रो. राघवन ने कहा कि उत्तराखंड सरकार हैस्को जैसी संस्थाओं की मदद से जीईपी को लेकर अच्छा काम कर रही है। जीईपी व्यवस्था केा लागू किया जा सकेें, इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस समेत अन्य आधुनिकतम वैज्ञानिक तकनीकाें का भी इस्तेमाल किया जाएगा। 

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ग्लोबल वार्मिंग से बचना है तो जंगल, जल, जमीन को बचाना जरूरी 

ग्लोबल वार्मिंग से बचना है तो जंगल, जल और जमीन को बचाना जरूरी है। इसके लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तर्ज पर सकल पर्यावरणीय उत्पाद (जीईपी) व्यवस्था लागू करनी होगी। इससे न सिर्फ  गांवों की आर्थिकी मजबूत होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जल, जंगल और जमीन को बचाया जा सकता है। जीईपी पर जोर नहीं दिया गया तो देश में जल संकट के साथ ही अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ेगा। उक्त बातें पर्यावरणविद् एवं पद्मभूषण डॉ. अनिल जोशी ने भारतीय वन्यजीव संस्थान में ‘सकल पर्यावरणीय उत्पाद’ पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कही।

डॉ. जोशी ने कहा कि कितनी विडंबना की बात है कि जल, जंगल, हवा किसी भी रूप में हमारे जीडीपी का हिस्सा नहीं है। जबकि इन संसाधनों का इस्तेमाल करने के बाद निकलने वाला परिणाम जीडीपी का हिस्सा बन जाता है। हवा, मिट्टी और पानी की खराब गुणवत्ता स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन जीडीपी में इसका कोई उल्लेख नहीं होता। देश में ‘क्वांटिटी फॉरेस्ट’ की जगह ‘क्वालिटी फॉरेस्ट’ पर जोर देना होगा। पर्यावरण संरक्षण को लेकर जो नीतियां बनें, उसमें जनहित का पूरा ध्यान रखा जाए। डॉ जोशी ने कहा कि देश में बहुत कम राज्य हैं जो भारतीय वन नीति के अनुसार वन संरक्षण के 33 फीसदी लक्ष्यों को पूरा करते हैं।

अब तक 1000 से अधिक नदियां सूख चुकी हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते ग्लेशियर तेजी से पिघलने के साथ ही पीछे खिसक रहे हैं। ऐसे में केंद्र, राज्य सरकारों और वैज्ञानिकोें को इस पर ध्यान देना होगा। अंधाधुंध विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सेमिनार में केंद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. के विजय राघवन ने कहा कि जीईपी व्यवस्था लागू करने को लेकर सभी एजेंसियों, राज्य सरकारों और तकनीकी संस्थानों को मिलजुल कर काम करना होगा। एक-दूसरे को तकनीकी डाटा मुहैया कराने के साथ ही आमजन से यह रायशुमारी करनी होगी कि वे पर्यावरण संरक्षण के साथ कितना विकास चाहते हैं? सेमिनार में विशेषज्ञों ने ग्रीन बोनस देने और जीडीपी के ही जीईपी पर जोर देने की बात कही। यूसर्क के निदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने ‘इकोलॉजी क्लब’ के गठन पर जोर दिया। 

यह रहे उपस्थित 
सेमिनार में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा, वन्यजीव संस्थान निदेशक डॉ. धनंजय मोहन, एफ आरआई निदेशक अरुण सिंह रावत, यूसैक निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट, डब्ल्यूआरआई की वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ मधु वर्मा, डॉ. रुचि बड़ोला, आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर आशीष पांडे, सीईओ स्वप्न मेरा, डॉ. वीणा श्रीनिवासन, वाडिया निदेशक डॉ. कालाचंद सांई समेत कई वैज्ञानिक और शोधार्थी उपस्थित रहे।

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