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तेरे हाथ से पीकर पानी, दासी से बन जाऊं रानी....
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करवा चौथ के अवसर पर निर्जला व्रत रखकर इंदर रोड स्थित स्त्री कल्याण सभा भवन में पूजा अर्चना करती ?
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देहरादून। पूरे शहर में बृहस्पतिवार को करवाचौथ पर्व का उल्लास रहा। सुबह से शाम तक मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना का दौर चला। दोपहर बाद जगह-जगह व्रती महिलाओं ने सामूहिक कथा और पूजा अर्चना की। रात आठ बजकर 18 मिनट पर चांद दिखते ही छलनी में दीपक रखकर चांद और साजन का दीदार किया। उसके बाद अर्घ्य देकर पति के हाथों से पानी पीकर व्रत का पारण किया।
करवाचौथ महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। इसके लिए महिलाएं सप्ताहभर पहले से खरीदारी में जुट जाती हैं। पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें निर्जल व्रत रखती हैं। इसके लिए महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना और कथा भी सुनतीं है। सुहागिनों को करवा चौथ की पूजा का विधान और व्रत के महत्व के बारे में बताया गया। रात करीब 8:18 बजे चंद्रोदय के बाद सुहागिनों ने शिव, पार्वती और गणेश की पूजा की। आकर्षक उपहार पाकर सुहागिनों के चेहरे खिल उठे। उसके बाद महिलाओं ने अपनी सास को करवे, साड़ी और शृंगार की सामग्री भेंट की। गल्जवाड़ी स्थित इंद्ररानगर में गोरखाली समुदाय की महिलाओं और रेसकोर्स में महिलाओं ने सामूहिक रूप से दोपहर में करवा चौथ की कथा सुनी। उसके बाद सबने मिलकर विशेष पूजा की।
चांद का महत्व
करवाचौथ व्रत को पूरा करने के लिए महिलाएं छलनी की ओट में चांद को देखने के बाद अपने पति को देखती हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन चंद्रमा को भगवान शिव या गणेश का प्रतिनिधि माना जाता है। हिंदू धर्म में इन दोनों की मुख्य रूप से पूजा होती है। माना जाता है कि इस दिन दुल्हन की तरह सजी महिलाओं को परिवार के बड़े सदस्यों को देखने पर पाबंदी होती है। इसलिए छलनी का इस्तेमाल किया जाता है। छलनी को घूंघट के तौर पर माना जाता है।
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करवाचौथ महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। इसके लिए महिलाएं सप्ताहभर पहले से खरीदारी में जुट जाती हैं। पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें निर्जल व्रत रखती हैं। इसके लिए महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना और कथा भी सुनतीं है। सुहागिनों को करवा चौथ की पूजा का विधान और व्रत के महत्व के बारे में बताया गया। रात करीब 8:18 बजे चंद्रोदय के बाद सुहागिनों ने शिव, पार्वती और गणेश की पूजा की। आकर्षक उपहार पाकर सुहागिनों के चेहरे खिल उठे। उसके बाद महिलाओं ने अपनी सास को करवे, साड़ी और शृंगार की सामग्री भेंट की। गल्जवाड़ी स्थित इंद्ररानगर में गोरखाली समुदाय की महिलाओं और रेसकोर्स में महिलाओं ने सामूहिक रूप से दोपहर में करवा चौथ की कथा सुनी। उसके बाद सबने मिलकर विशेष पूजा की।
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चांद का महत्व
करवाचौथ व्रत को पूरा करने के लिए महिलाएं छलनी की ओट में चांद को देखने के बाद अपने पति को देखती हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन चंद्रमा को भगवान शिव या गणेश का प्रतिनिधि माना जाता है। हिंदू धर्म में इन दोनों की मुख्य रूप से पूजा होती है। माना जाता है कि इस दिन दुल्हन की तरह सजी महिलाओं को परिवार के बड़े सदस्यों को देखने पर पाबंदी होती है। इसलिए छलनी का इस्तेमाल किया जाता है। छलनी को घूंघट के तौर पर माना जाता है।
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