नाबालिग का अपहरण कर दुष्कर्म के दोषी फूफा को 20 साल की कैद, डीएनए मिलान से हुई थी पुष्टि
- दोषी पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया, 15 हजार देने होंगे पीड़िता को
- 19 सितंबर 2018 को विकासनगर में दर्ज हुआ था मुकदमा
विस्तार
देहरादून नाबालिग का अपहरण और दुष्कर्म करने वाले फूफा को फास्ट ट्रैक जज अनिरुद्ध भट्ट की कोर्ट ने दोषी करार देते हुए 20 साल कैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने दोषी पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया, जिसमें से 15 हजार रुपये पीड़िता को देने होंगे।
शासकीय अधिवक्ता अरविंद कपिल ने बताया कि मुकदमा 19 सितंबर 2018 को विकासनगर कोतवाली में दर्ज किया गया था। पीड़िता के पिता ने पुलिस को बताया था कि उसकी बेटी अपने फूफा के यहां रहकर पढ़ाई कर रही थी।
उससे वह कई सालों से दुष्कर्म करता आ रहा था। यह बात जब घरवालों को पता चली तो इस संबंध में गांव में एक मीटिंग कर आरोपी को समझाया गया। मगर, वह नहीं माना और उसका अपहरण कर अपने साथ ले गया।
पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी को उसके गांव से ही गिरफ्तार कर लड़की को मुक्त करा लिया था। पीड़िता और आरोपी के कपड़ों को भी जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा गया। दो माह के भीतर पुलिस ने इस मुकदमे में आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी।
ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने लड़की की उम्र को लेकर सवाल उठाए, लेकिन उसके स्कूली प्रमाणपत्रों से साबित हुआ कि उसकी उम्र 18 वर्ष से कम है। इस मुकदमे में अभियोजन की ओर से कुल 10 गवाह पेश किए गए। जबकि, 20 दस्तावेजी साक्ष्य अदालत में प्रस्तुत किए गए, जिनमें दुष्कर्म की पुष्टि करने वाली एफएसएल की रिपोर्ट भी शामिल थी। गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोषी को मंगलवार को सजा सुना दी।
डीएनए मिलान से मिला मुकदमे को बल
फोरेंसिक जांच के लिए पीड़िता के अंत:वस्त्रों को भेजा गया था। जांच में पाया गया कि इन वस्त्रों पर मनुष्य के शुक्राणु लगे हैं। इनके डीएनए और आरोपी के खून के डीएनए का मिलान हुआ तो एक ही पाया गया। इस आधार पर दुष्कर्म की पुष्टि होना भी कड़ी सजा का आधार बना।
उम्र के लिए जरूरी नहीं पहली बार प्रवेश का प्रमाणपत्र
दरअसल, इस मुकदमे में अभियोजन ने पीड़िता की उम्र के लिए उसके स्कूल की टीसी अदालत में प्रस्तुत की थी। बचाव पक्ष ने इस पर यह कहते हुए सवाल उठाया कि यह दस्तावेज उसके प्रथम बार स्कूल में प्रवेश से संबंधित नहीं है।
लिहाजा उसकी उम्र प्रमाणित नहीं होती। मगर, अभियोजन ने ‘महादेव बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट की नजीर पेश की। इसमें साफ आदेश हैं कि आयु निर्धारण के लिए पोक्सो के बाद किशोर न्याय अधिनियम 2007 में संशोधन कर इसे किशोर न्याय अधिनियम (देखभाल व संरक्षण)-2015 किया गया था। इसके तहत किशोर की आयु निर्धारण के लिए उसके किसी भी स्कूल या कक्षा का दस्तावेज ही काफी होता है। इसके लिए प्रथम बार की आवश्यकता नहीं है।