{"_id":"583155d84f1c1bb304b39677","slug":"gairsain-public-angry-with-uttarakhand-government","type":"story","status":"publish","title_hn":"गैरसैंणवासियों ने कहा 'अगर राजधानी ऐसी होती है तो नहीं चाहिए'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गैरसैंणवासियों ने कहा 'अगर राजधानी ऐसी होती है तो नहीं चाहिए'
राकेश खंडूड़ी /अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 20 Nov 2016 02:30 PM IST
विज्ञापन
gairsain
- फोटो : arunesh pathaniya/ amarujala dehrdun
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गैरसैंण के मस्तक भराड़ीसैंण पर गुलाबी सपनों का मुकुट पहनाकर सरकार एक बार फिर उसी अंदाज में विदा हुई, जिसे गैरसैंण के बाशिंदों ने कभी पसंद नहीं किया।
विज्ञापन
सातवीं बार और वह भी चुनावी साल में सरकार जब उनके दरवाजे पर पहुंची तो वे कुछ अनोखा होने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन पहाड़ के सरोकारों के नाम पर सरकार ने उनकी तरक्की के लिए सड़क नेटवर्क जोड़ने के जो वादे किए, वो उन्हें सबसे पहले सत्र में की गई घोषणाओं का रिप्ले दिखाई दिया।
विज्ञापन
भराड़ीसैंण में करोड़ों रुपये के आलीशान भवन और विधानसभा का एक भव्य ढांचा खड़ा करके सरकार बेशक इसे ऐतिहासिक कारनामे की मिसाल बता रही है, लेकिन गैरसैंणवासी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। हताश मन से वह कह रहे हैं कि यदि राजधानी ऐसी होती है, तो उन्हें नहीं चाहिए। उनकी सरकार से सिर्फ इतनी ही गुजारिश है कि वह उनके बुनियादी सवालों के हल तलाश दे।
विज्ञापन
राजनीतिक दल गैरसैंण को इस अंदाज में तरजीह देना चाहते हैं ताकि गैरसैंण से बाहर यही संदेश जाए कि वह उनके लिए भी उतनी ही फिक्रमंद है। मगर सरकारों और सियासी दलों से जुदा गैरसैंणवासियों की सोच ज्यादा स्पष्ट और बेबाक है। वे इसलिए व्यथित हैं कि एक या दो बार नहीं सातवीं बार उनकी दुनिया बदलने के वादे हुए।
मगर सत्ता की गुलाबी रोशनी में नहाते भराड़ीसैंण की तलहटी में बसा गैरसैंण का अंधेरा सच जहां का तहां है। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी और पूर्व ज्येष्ठ प्रमुख गोविंद सिंह नेगी कहते हैं सरकार अपनी मर्जी से आती है मर्जी से चली आती है। धूल उड़ाती सैकड़ों गाड़ियां, अफसरों, नेताओं की लंबी फौज, पुलिस के कड़े पहरे के बीच स्थानीय लोगों के निर्बाध आवागमन पर रोक को यदि राजधानी जैसा होना कहते हैं, तो साहब ऐसी राजधानी हमें नहीं चाहिए।
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गोपाल दत्त गैडी कहते हैं कि गैरसैंण थोड़ा बहुत बदला है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है। गैरसैंण से रुख करने के बाद सरकार को यह सोचना चाहिए कि उसके जाने के बाद भी सामुदायिक केंद्र में पूरे डॉक्टर होते भी हैं कि नहीं। हमारे छोटी छोटी बुनियादी दिक्कतों का निदान हो जाए, इतना ही काफी है।