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...तो सीएम ऑफिस से उठेगा लाखों के घोटालों से पर्दा
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 25 Jan 2015 02:54 PM IST
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उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में हुए लाखों रुपए के फर्जी ईंधन बिल घोटाले में मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी भुगतान के आदेशों की सत्यता का पर्दा जल्द उठेगा।
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संदिग्ध भूमिका पर स्थिति होगी साफ
सूत्रों के अनुसार मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को जांच सौंपी जा रही है, जिससे मुख्यमंत्री कार्यालय में एक विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) की संदिग्ध भूमिका पर स्थिति साफ होगी।
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उल्लेखनीय है कि विभागीय जांच में वित्तीय वर्ष 2009-10 से 2012-13 तक चार जनपदों में रहे सीएमओ तो फर्जीवाड़े के आरोपी साबित हो गए, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय में बिल भुगतान के पीछे असल में था कौन, यह अब तक सामने नहीं आया है।
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नवंबर 2014 में विभाग के निदेशक एलके गुसाईं ने इस मामले में जांच कर आठ सीएमओ के आरोपी होने की रिपोर्ट शासन को सौंपी थी। बता दें कि मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद एक ट्रेवलिंग एजेंसी को चार जिलों के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएमओ) ने 1.44 करोड़ का भुगतान किया।
सूत्रों के अनुसार, मामले में विधिक राय लेने के बाद अब एक वरिष्ठ सचिव को यह जांच सौंपे जाने के लिए मुख्यमंत्री से अनुमोदन मांगा गया है। शासन ने विधिक राय के बाद पहले एफआईआर करवाने का फैसला लिया था, लेकिन अब असल खेल तक पहुंचने के लिए शासन से होनी वाली जांच का इंतजार किया जा रहा है।
रिकवरी भी हो सकती है आरोपियों से
स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद मामले में संलिप्त पाए गए सभी आरोपी सीएमओ से रिकवरी भी संभावित है, लेकिन शासन आरोपी आठ सीएमओ पर कार्यवाही से पहले फर्जी आदेशों तक पहुंचना चाहता है।
मामला मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा है, जिससे शासन जल्दबाजी में नहीं है। उच्च स्तरीय जांच के बाद ही स्वास्थ्य विभाग के आरोपी अधिकारियों पर कार्यवाही होगी।
ये है मामला
चार जिलों टिहरी, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार के सीएमओ कार्यालयों में वीआईपी दौरे पर ट्रेवलिंग एजेंसी के वाहनों का इस्तेमाल हुआ
सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2009-10 से 2012-13 के दौरान कई बार वाहन के भुगतान के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन के बिल फर्जी थे। इन बिलों के भुगतान के लिए सीएमओ स्तर से संस्तुति दी गई।
सीधे हुए भुगतानों में तो सीएमओ की गलती है, लेकिन लाखों के बकाया भुगतान के लिए सीएमओ को मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश दिए गए। जिस आदेश को आधार बनाकर लाखों रुपए का भुगतान किया गया है उस आदेश की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है।