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स्कूलों की बेईमानी एक टीचर की जुबानी

Mon, 22 Sep 2014 11:29 AM IST
ओमप्रकाश तिवारी/अमर उजाला, देहरादून
ओमप्रकाश तिवारी/अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 22 Sep 2014 11:29 AM IST
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fraud in dehradun school

स्कूल जहां भविष्य के नागरिक तैयार किए जाते हैं, जहां बच्चों को शिक्षा और संस्कार दिए जाते हैं। सभ्यता और नैतिकता के पाठ पढ़ाए जाते हैं। लेकिन निजीकरण के दौर में अधिकतर प्राइवेट स्कूल बच्चों से लेकर टीचरों तक के शोषण के अड्डे बन गए हैं।

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अधिक फीस वसूलने से लेकर पूरे साल किसी न किसी नाम से हर माह कुछ न कुछ वसूला ही जाता है। यही नहीं पढ़ाई के नाम पर भी धांधली की जा रही है। टीचरों को उचित और सम्मानजनक वेतन नहीं दिया जा रहा है। जानते हैं एक मां जोकि टीचर भी हैं, उनकी जुबानी निजी स्कूलों की मनमानी और बेईमानी की कहानी।
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यह बताती हैं कि मेरे दो बच्चे पढ़ रहे हैं। एक आठवीं है और दूसरा 12वीं में। 12वीं के बच्चे की फीस हर माह 2800 रुपये देनी पड़ती है। जबकि आठवीं के बच्चे की फीस हर माह 1780 रुपये देना पड़ रहा है। वह कहती हैं कि बिजनेसमैन और सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी तो इतनी महंगी फीस भर सकते हैं, लेकिन एक साधारण और आम आदमी इतनी महंगी फीस कहां से लाए? लेकिन आम आदमी करे भी तो क्या? बच्चे न पढ़ाए तो उसका भविष्य बर्बाद। बच्चों की महंगी फीस भरे तो उसका खुद का वर्तमान चौपट हो जाता है।
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दसवीं के बच्चे की करियर काउंसिलिंग

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कई स्कूलों में दसवीं के बच्चों से करियर काउंसिलिंग के नाम 500 रुपये वसूल लिए जाते हैं। काउंसिलिंग के लिए किसी को बुला लेते हैं और उसकी फीस देने के लिए बच्चों से पैसे वसूलते हैं। इसी तरह दसवीं और 12वीं के बच्चों के सालाना परीक्षा के पंजीकरण के लिए भी कई स्कूल 250 से 500 रुपये तक वसूलते हैं जबकि यह सब पैसे फीस में ही जुड़ा होता है।

फेयरवेल के नाम पर वसूली
स्कूलों में दसवीं और 12वीं के बच्चों को फेयरवेल पार्टी दी जाती है। इस पार्टी के नाम पर बच्चों से मनमाना पैसा लिया जाता है। नहीं देने वाले बच्चों को दंडित किया जाता है। कई बार उन्हें बेइज्जत भी किया जाता है।

प्रैक्टिकल के नाम पर भी वसूली
दसवीं और 12वीं के बच्चों से प्रैक्टिकल के नाम पर जमकर वसूली होती है। साइंस वाले छात्र-छात्राओं से तो साइंस के तीन और एक कंप्यूटर के प्रैक्टिकल के लिए प्रति सब्जेक्ट 100 से 200 रुपये वसूले जाते हैं। कुछ स्कूलों में तो गणित का भी प्रैक्टिकल होने लगा है।

एग्जाम के नाम पर बच्चों का शोषण

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बताती हैं कि आज लगभग सभी स्कूलों में बच्चों के एग्जाम चल रहे हैं। हालत यह है कि एक-एक दिन में दो-दो पेपर लिए जा रहे हैं। यही नहीं पेपरों के बीच में गैप तक नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में बच्चे तैयारी कैसे करें? वह सवाल करती हैं कि बच्चा कितना पढ़ेगा और कैसे पढ़ेगा? एक की तैयारी करता है तो दूसरा भूल जाता है। स्कूल वालों का कहना होता है कि बच्चा पहले से तैयारी करे तो एग्जाम के समय पढ़ने की जरूरत नहीं होगी लेकिन उन्हें कौन बताए कि एग्जाम के समय एक बार संबंधित विषय का रिविजन तो करना ही पड़ता है।

टीचरों को बहुत कम वेतन
यह बताती हैं कि चूंकि वह मां के साथ एक टीचर भी हैं इसलिए जानती हैं कि प्राइवेट स्कूलों में टीचरों के साथ कितना अन्याय किया जा रहा है। कुछ नामी स्कूलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर में टीचरों को 5-6 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता है।

यही नहीं यदि टीचर फ्रेशर है तो उसे 3-4 हजार रुपये मासिक ही दिया जाता है। वह हंसते हुए कहती हैं कि अधिकतर शिक्षकों को लोग कार या अपने स्कूटर पर चलते देखते होंगे। लेकिन लोगों को नहीं मालूम की यदि उनके पति न कमाएं तो बेचारी टीचर तो पैदल भी न सकें। सारी चमक दमक पतियों के वेतन के दम पर होती है। स्कूल वाले बच्चों से इतनी ज्यादा फीस वसूलते हैं और शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन भी नहीं देते। ऐसे में टीचर भी मन लगाकर अच्छे ढंग से नहीं पढ़ाते। वह भी सोचते हैं कि चलो जैसे वेतन मिल रहा है उतना ही पढ़ाया जाए।

छुट्टी पर कटता है वेतन

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वह बताती हैं कि टीचरों की छुट्टी पर वेतन काट लिया जाता है। बहुत कम स्कूल हैं जो साल में कैजुअल लीव के तौर पर 12 छुट्टियां देते हैं। जो स्कूल सीएल देते भी हैं वह भी वेतन से पैसे काटते हैं। एक दिन की छुट्टी लो तो दो दिन का पैसा काट लेते हैं। महीने में तीन दिन दस-दस मिनट लेट स्कूल पहुंचे तो आधे दिन की सैलरी काट लेते हैं। मेडिकल लीव और अर्न लीव (ईएल) जैसी छुट्टियां तो देते ही नहीं हैं।

वेतन न बढ़ाना पड़े इसलिए निकाल लेते हैं टीचर को
बताती हैं कि कई स्कूलों में एक-एक माह में तीन-तीन टीचर छोड़कर चली जाती हैं। स्कूल वाले बताते हैं कि उन्हें पारिवारिक दिक्कत थी इसलिए छोड़ गईं। लेकिन सच यह होता है कि वेतन न बढ़ाना पड़े इसलिए एक साल से अधिक पढ़ाने वाली शिक्षक को स्कूल वाले निकाल देते हैं। उसके बाद कम पैसे में दूसरी टीचर रख लेते हैं।

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