मनरेगा के नाम पर बड़े घोटाले का खुलासा, ग्राम विकास अधिकारी अरेस्ट
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गल्जवाडी में मनरेगा में हुए लाखों के घोटाले में पुलिस ने सोमवार को ग्राम विकास अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में अब तत्कालीन खंड विकास अधिकारी और गांव प्रधान लीला शर्मा पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। पुलिस की विवेचना में तार जाल के फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन के दुरूप्रयोग की पुष्टि हुई है। सरकारी रिकार्ड में हेरीफेरी कर गबन का यह मामला राष्ट्रपति शासन में दर्ज हुआ था, लेकिन सरकार बदलते ही विवेचना में तेजी आ गई।
राष्ट्रपति शासन के दौरान पांच मई 2016 को गौतम प्रकाश शर्मा ने कैंट कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया था कि गांव प्रधान और कांग्रेस नेत्री लीला शर्मा और ग्राम पंचायत अधिकारी तपेन्द्र सिंह राणा ने फर्जी बिल बाउचर लगाकर मनरेगा के तहत लाखों का गबन कर लिया है। प्रधान लीला शर्मा को हाईकोर्ट की शरण लेने पर राहत मिल गई थी।
हाईकोर्ट ने प्रधान को विवेचना में सहयोग करने के आदेश दिए थे। इसी बीच प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो गबन के इस मामले की विवेचना में तेजी आ गई। एक सप्ताह पहले पुलिस प्रधान से दस्तावेज लेने गई थी तो मामला गरमा गया। प्रधान लीला शर्मा के पुलिस पर उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय उनके समर्थन में कैंट कोतवाली पहुंच गए, जहां पर काफी देर तक हंगामा हुआ था। विवेचना में महिला उप निरीक्षक को रखने के आश्वासन पर यह लोग शांत हुए थे।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वीटी अग्रवाल ने सोमवार को बताया कि मनरेगा योजना के तहत 2009 से लेकर 2011 के बीच चार योजनाओं के तहत गल्जवाड़ी में तार जाल का काम कराया गया था। विवेचना में इनके द्वारा फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि हुई है। उसी आधार पर सोमवार को ग्राम विकास अधिकारी तपेन्द्र सिंह राणा (फिलहाल डोईवाला में तैनाती) को गिरफ्तार कर लिया है। दोपहर बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि मुकदमे में साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की धारा बढ़ाई गई है। फोरेंसिक जांच में इस बात की पुष्टि हुई है।
पंजीकरण 12 में हुआ, बिल 2009 में लगाए
खाते से गलत ढंग से निकाली रकम
पुलिस विवेचना के दौरान मनरेगा योजना से संबधित बैंक खाते से आरोपियों द्वारा नियम विरुद्ध रकम निकाले जाने की बात सामने आई है। मनरेगा योजना के खाते से धन सीधे कार्यवाही संस्था को ट्रंासफर होता है। जबकि आरोपियों ने धन का आहरण स्वयं के पक्ष में कराया है।
पंजीकरण 12 में हुआ, बिल 2009 में लगाए
मनरेगा घोटाले में पुलिस विवेचना में बेहद दिलचस्प तथ्य सामने आया है। एसएसपी स्वीटी अग्रवाल की माने तो विवेचना के दौरान पाया गया कि 2009 में जिन फर्मों के बिल बाउचर लगाए गए थे। उन फर्मों का पंजीकरण 2012 में होने की बात सामने आई है। प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी के कब्जे में मिले अभिलेखों में छेड़छाड़ किए जाने की बात पुष्टि हुई है।
संपति की कराई जाएगी जांच
मनरेगा घोटाले में शामिल अन्य लोगाें को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा। आरोपियों की चल व अचल संपत्ति की भी जांच पड़ताल की जा रही है।
स्वीटी अग्रवाल, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक
वसूली के हुए थे आदेश
गल्जवाडी मनरेगा घोटाले की शिकायत पर शासन द्वारा कराई गई विभागीय जांच में अनियमितता की पुष्टि हुई थी। जांच में ग्राम पंचायत विकास अधिकारी, ग्राम प्रधान व कनिष्ठ अभियंता मनरेगा से 10 लाख 47 हजार रुपये की वसूली किए जाने की जाने की संस्तुति की गई थी। जाँच अधिकारी द्वारा ग्राम पंचायत गल्जवाडी के पांच वर्षों के कार्यों की स्पेशल आडिट कराने को कहा था। आरोप है कि जांच के उपरांत आरोपियों ने अभिलेखों, बिल बाउचर और कैश बुक को नष्ट कर बदल दिया गया था।