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लगातार हो रही मौतों के बाद भी चुप्पी क्यों?

Fri, 15 Nov 2013 11:12 AM IST
प्रेम प्रताप सिंह/ अमर उजाला, देहरादून
प्रेम प्रताप सिंह/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 15 Nov 2013 11:12 AM IST
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forest department careless about leopard death

देहरादून में बुधवार को हादसे में गुलदार की मौत के बाद एक बार फिर वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा हो गया है।

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आए दिन ऐसे हादसे होने के बावजूद वन्यजीवों को बचाने के लिए वन विभाग कोई ठोस रणनीति तैयार नहीं कर पाया है। सच्चाई यह है कि प्रदेश में नेशनल हाईवे गुलदार के लिए मौत का कुआं बनते जा रहे हैं। पिछले पांच साल में लगभग 32 गुलदारों की सड़क हादसे में मौत हो चुकी है।
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प्रदेश के विभिन्न वन्यजीव बाहुल्य क्षेत्रों से नेशनल हाईवे गुजरते हैं। इन सड़कों पर वाहनों की गति का कोई नियंत्रण नहीं होता, जिसका नतीजा हादसों के रूप में सामने आता है।
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उत्तराखंड वन्यजीव बहुल प्रदेश है। यहां पर वन्यजीवों के कॉरिडोर हैं। इन्हें चिह्नित करके जरूरत के अनुसार फ्लाईओवर और स्पीड ब्रेकर बनाए जाने चाहिए।
- विभाष पांडव, वैज्ञानिक भारतीय वन्यजीव संस्थान

वन्यजीवों को बचाने के लिए जंगलात महकमे को नए सिरे से रणनीति बनानी चाहिए। ऐसा न होने पर बाघ, गुलदार, हिरन सहित अन्य वन्यजीवों की हादसों में मौत होती रहेगी।
- एएस नेगी, पूर्व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक

इस मामले को लेकर लोक निर्माण विभाग, राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिकारियों के साथ जल्द बैठक की जाएगी। ऐसे हादसों को कैसे नियंत्रित किया जाए, इस पर भी विचार किया जाएगा।
- एसएस शर्मा, प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव

ऐसे पहुंच रहे एफआरआई में गुलदार
प्रभागीय वन अधिकारी सुशांत पटनायक ने बताया कि वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) में भी काफी घना जंगल है। उसके पीछे वन प्रभाग देहरादून का झाझरा और मालसी रेंज का जंगल लगता है, जहां गुलदार काफी संख्या में हैं।


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झाझरा, चांदमारी सहित अन्य क्षेत्रों में गुलदार का लगातार मूवमेंट बना रहता है। ऐसे में ये गुलदार अपनी सीमा को पार करके एफआरआई के जंगल तक पहुंच जाते है। पहले से भी गुलदार एफआरआई के जंगल में दिखते रहे हैं। एफआरआई में पहुंचने के बाद ये आबादी की ओर रुख करने लगते हैं। बुधवार को एफआरआई के सामने हुआ हादसा इसी का नतीजा है।

भोजन की तलाश में बाहर आ रहे गुलदार
विशेषज्ञों का कहना है कि राजधानी के आसपास के जंगलों में गुलदारों के लिए आहार का सबसे अधिक संकट है। इसलिए
गुलदार आबादी की ओर रुख कर रहे हैं। गुलदार चूहा, खरगोश, मेडिकल वेस्ट और कूड़े में पड़ी हड्डी-मांस को खाकर भी जीवित रह जाता है। गुलदार की प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता सबसे अधिक है।

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