केदारघाटी लाइव: मंदाकिनी का रौद्र रूप, भाग रहे लोग
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केदारघाटी जलप्रलय के ठीक एक साल और एक माह बाद मंदाकिनी घाटी ने फिर से वही रौद्र रूप धर लिया है। अस्थायी पुल बह गए या हटा दिए गए हैं। ट्रालियों से आवागमन हो रहा है। मंदाकिनी का पानी बस्तियों की तरफ आ रहा है। इस वजह से लोगों को मंगलवार रात्रि अपना घर भी छोड़ना पड़ा।
रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे सिल्ली बाजार और ठीक इसी के सामने मंदाकिनी नदी पार पश्चिमी चाका गांव के निवासी डर के मारे रात में सो भी नहीं सके।
जलप्रयलय में आए मलबे से यहां रिवर बेड (नदी तल) तीन से चार मीटर ऊपर उठ गया है। सिल्ली बाजार और चाका गांव में सुरक्षा दीवार का निर्माण नहीं हो पाया है।
सिल्ली बाजार में देवी प्रसाद गोस्वामी के भवन सहित अन्य लोगों के भवनों के भूतल में पानी घुस रहा है। हालांकि चाका गांव थोड़ा ऊपर है। लेकिन चट्टान पर बसे होने के कारण यहां खतरा बरकरार है।
उफनाती नदी पार से लाते हैं पीने का पानी
पिछले साल 16 जून को चाका को जोड़ने वाला सिल्ली झूला पुल बह गया था। लोनिवि ने यहां नदी पार करने के लिए ट्राली और अस्थायी पुल बनाया है। अस्थायी पुल के लिए रास्ता नहीं होने के कारण ज्यादातर आवाजाही ट्राली से हो रही है।
चाका निवासी विमला कंडारी बताती है कि अभी पिछले साल आई आपदा का डर मन से नहीं गया था कि 15 जुलाई की रात मंदाकिनी नदी के रौद्र रुप ने फिर उसकी तबाही के मंजर की याद दिला दी।
रात में नदी के समीप के लोगों ने घर छोड़ दिया। डर के मारे दुकानों से सामान हटा दिया गया। सतेंद्र कंडारी कहते हैं कि पिछले साल से अभी तक चाका गांव में पानी नहीं आया है जबकि सरकार आपदा प्रभावितों को पूर्ण सुविधा देने का दावा कर रही है।
यहां के 13 घरेलू कनेक्शनों सहित सार्वजनिक स्टैंड पोस्ट में पानी नहीं चल रहा है। लोग ट्राली में नदी पार से सिल्ली बाजार से पानी लाते हैं।
रात में मकान पर चढ़ने लगा पानी
सिल्ली से करीब पांच किमी आगे विजयनगर, जवाहरनगर और गंगानगर की भी स्थिति ऐसी ही है। मंदाकिनी नदी बुधवार के मुकाबले बृहस्पतिवार को आधे पर आ गई है लेकिन लोगों के मन से खौफ नहीं गया है।
जवाहरनगर में बस्ती के आगे सुरक्षा दीवार का निर्माण देर से शुरू हुआ। इस वजह से यह समय पर नहीं बन पाई। 15 जुलाई की रात पानी इतना बढ़ा कि मकान के पुश्ते पर चोट मारने लगा।
रात लोगों को दूसरे स्थान पर जाना पड़ा। अब मैं और मेरा बेटा रात को बारी-बारी घर से बाहर आकर नदी का पानी देखते रहते हैं।